नारी डेस्क: सड़क किनारे बैठकर डीप-फ्राइड स्नैक्स से भरी एक ही पेपर प्लेट को दोस्तों के साथ शेयर करने और पकौड़ों व समोसों को चटनी से भरी प्लेट में डुबोकर खाने का मजा ही कुछ और है। पीढ़ियों से इसे स्नैक्स को पैक करने का एक सुविधाजनक, सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल तरीका माना जाता रहा है। लेकिन बहुत से लोग यह नहीं जानते कि रोजाना की यह आदत उन्हें हानिकारक रसायनों और अशुद्धियों के संपर्क में ला सकती है, जिनका खाने में कोई स्थान नहीं होना चाहिए। हालांकि अखबार देखने में भले ही नुकसानदायक न लगे, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह 'फ़ूड-ग्रेड' पैकेजिंग नहीं है।
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अखबार से लिपटे खाने के नुकसान
असल में, स्वास्थ्य अधिकारियों और वैज्ञानिक अध्ययनों ने बार-बार चेतावनी दी है कि खाने को लपेटने, परोसने या उससे तेल सोखने के लिए छपे हुए अख़बारों का इस्तेमाल करने से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम हो सकते हैं, खासकर तब जब खाना गर्म, तैलीय या नमी वाला हो। सबसे बड़ी चिंता अखबारों में इस्तेमाल होने वाली प्रिंटिंग स्याही को लेकर है। खाने-पीने की चीज़ों के लिए सुरक्षित पैकेजिंग मटीरियल के उलट, अखबार की स्याही में पिगमेंट, सॉल्वेंट, रेज़िन और दूसरे केमिकल कंपाउंड का जटिल मिश्रण होता है। इनमें से कुछ पदार्थ कागज से खाने की चीज़ों में जा सकते हैं, खासकर तब जब वे गर्मी या तेल के संपर्क में आते हैं।
खाने को जहर बना देता है प्रिंटिंग इंक
'फूड एडिटिव्स एंड कंटैमिनेंट्स' में छपी रिसर्च से पता चला है कि कुछ खास हालात में प्रिंटिंग इंक (स्याही) के केमिकल खाने में मिल सकते हैं। फैटी (चर्बी वाले) खाने की चीज़ों पर इसका असर ज़्यादा होता है क्योंकि वे इन कंपाउंड्स को आसानी से सोख लेती हैं। अखबार की स्याही को खाने के संपर्क में आने के हिसाब से नहीं बनाया जाता है। स्याही और प्रिंटिंग के तरीके के आधार पर, इसमें मिनरल ऑयल, पिगमेंट, प्लास्टिसाइज़र और दूसरे इंडस्ट्रियल केमिकल हो सकते हैं। कई स्टडीज में यह भी बताया गया है कि रीसायकल किए गए पेपर की पैकेजिंग से मिनरल ऑयल के अवशेष खाने में जा सकते हैं, खासकर सूखे और फैटी प्रोडक्ट्स में जिन्हें लंबे समय तक रखा जाता है।
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गर्मी और तेल से समस्या और बढ़ जाती है
जब अखबार ताज़े बने खाने के संपर्क में आते हैं, तो खतरा काफ़ी बढ़ जाता है। गर्म समोसे, फ्राइज़, भजिया, कटलेट और दूसरे तले हुए स्नैक्स में तेल होता है जो सॉल्वेंट का काम कर सकता है, जिससे अखबार की स्याही के केमिकल आसानी से खाने में मिल जाते हैं। करी या भाप में पके खाने की नमी का भी ऐसा ही असर हो सकता है। रिसर्चर्स ने पाया है कि ज़्यादा तापमान पैकेजिंग मटीरियल से खाने में केमिकल के मिलने की रफ़्तार को बढ़ा देता है। अगर स्याही की चिंता न भी हो, तो भी अखबारों में प्रिंटिंग, स्टोरेज, ट्रांसपोर्ट और हैंडलिंग के दौरान गंदगी या हानिकारक तत्व (कंटैमिनेंट्स) आ सकते हैं। ग्राहकों तक पहुंचने से पहले अखबार कई स्टेज से गुज़रते हैं। इस दौरान वे धूल, गंदगी, बैक्टीरिया, फंगस और पर्यावरण के प्रदूषकों के संपर्क में आ सकते हैं। उन्हें कई लोग छूते भी हैं, जिससे माइक्रोबियल कंटैमिनेशन (सूक्ष्मजीवों से गंदगी) का खतरा बढ़ जाता है।