
नारी डेस्क: एक स्टडी से पता चला है कि सामाजिक-आर्थिक स्थिति और जीवनशैली से जुड़े लंबे समय तक रहने वाले तनाव के कारण शरीर में लगातार सूजन बनी रहती है, जिससे दिल की बनावट में नुकसानदायक बदलाव हो सकते हैं। UK के इंपीरियल कॉलेज लंदन के रिसर्चर्स की अगुवाई में एक टीम ने UK बायोबैंक के 4,88,000 से ज़्यादा वयस्कों के डेटा का विश्लेषण किया। दिल की इमेजिंग और जेनेटिक डेटा के साथ-साथ, सूजन को मापने वाले ब्लड मार्कर 'ग्लाइकोप्रोटीन एसिटाइल्स' (GlycA) की भी जांच की गई।
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हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा
'यूरोपियन जर्नल ऑफ़ प्रिवेंटिव कार्डियोलॉजी' में प्रकाशित नतीजों से पता चलता है कि हार्ट अटैक और स्ट्रोक के ज़्यादा जोखिम के अलावा, जिन लोगों में GlycA का स्तर ज़्यादा था उनके दिल की बनावट में भी ज़्यादा बदलाव देखे गए। इनमें दिल की दीवारों का मोटा होना, दिल के चैंबर का छोटा होना और दिल में खून भरने की क्षमता कम होना शामिल है। रिसर्चर्स ने कहा कि दिल फेल होने की स्थिति तक पहुंचने से पहले ये बदलाव सालों तक चुपचाप विकसित हो सकते हैं। स्टडी बताती है कि लाखों लोग छिपी हुई सूजन के साथ जी रहे हो सकते हैं। यह सूजन धीरे-धीरे उनके दिल को बदल रही है और लंबे समय में नुकसान पहुंचा रही है, जिससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।
इन लोगों को ज्यादा खतरा
लोग सिर्फ़ अपने आस-पास के माहौल, आर्थिक स्थिति, परिवार की सेहत और जीवनशैली के कारण ज़्यादा जोखिम में हो सकते हैं। लंबे समय तक रहने वाली सूजन (क्रोनिक इन्फ्लेमेशन) जो शरीर के इम्यून सिस्टम का लंबे समय तक कम स्तर पर सक्रिय रहना है, कैंसर और डायबिटीज जैसी कई बीमारियों से जुड़ी रही है। अब इसे दिल की बीमारी के एक छिपे हुए कारण के तौर पर भी तेज़ी से पहचाना जा रहा है। हालांकि स्वास्थ्य से जुड़ी असमानताओं से निपटना अभी भी एक चुनौती है, लेकिन सूजन (inflammation) को कम करने के लिए हम कुछ कदम उठा सकते हैं, जैसे कि धूम्रपान और मोटापे जैसे जोखिम वाले कारकों को कम करना।" अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों में सूजन का स्तर लगातार ज़्यादा था यानी सबसे ऊपर के 20 प्रतिशत लोग उनमें सबसे कम स्तर वाले लोगों की तुलना में हार्ट अटैक और स्ट्रोक का जोखिम 43 प्रतिशत अधिक था, भले ही उन्हें पहले से कोई हृदय रोग न हो।
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तनाव जिंदगी में डालता है यह असर
GlycA का उच्च स्तर 'लेफ्ट वेंट्रिकुलर इंडेक्स्ड एंड-डायस्टोलिक वॉल्यूम' और 'स्ट्रोक वॉल्यूम' में कमी से जुड़ा था, साथ ही इसके कारण हृदय गति (heart rate) में भी बढ़ोतरी देखी गई। सूजन का उच्च स्तर सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन और मानसिक तनाव के साथ-साथ धूम्रपान और शरीर में अत्यधिक वसा (fat) जैसे स्थापित जोखिम कारकों से भी मज़बूती से जुड़ा हुआ था। शोधकर्ताओं का कहना है कि इन नतीजों से संकेत मिलता है कि क्रोनिक इन्फ्लेमेशन (लंबे समय तक रहने वाली सूजन) एक ऐसा जैविक माध्यम हो सकता है जिसके ज़रिए रोजमर्रा की जिंदगी का तनाव जिसमें गरीबी और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं शामिल हैं शरीर पर ऐसे जैविक प्रभाव डाल सकता है जिनसे हृदय रोगों का जोखिम बढ़ सकता है।