
नारी डेस्क: सऊदी अरब की जेल में करीब दो दशक बिताने के बाद केरल के कोझिकोड निवासी अब्दुल रहीम आखिरकार अपने वतन लौट आए। जैसे ही वह गुरुवार को एयरपोर्ट पर पहुंचे, वहां मौजूद लोगों की आंखें नम हो गईं। सबसे भावुक पल तब आया जब उन्होंने अपनी बुजुर्ग मां फातिमा को गले लगाया और दोनों की आंखों से आंसू छलक पड़े।
कैसे सऊदी अरब पहुंचे थे अब्दुल रहीम
साल 2006 में 24 वर्षीय अब्दुल रहीम ड्राइवर की नौकरी के लिए सऊदी अरब गए थे। वहां उन्हें एक दिव्यांग बच्चे अनास की देखभाल की जिम्मेदारी भी दी गई थी, जो लाइफ-सपोर्ट मशीन के सहारे जीवित था। एक दिन कार चलाते समय हुई एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना में अनास की मशीन हट गई और कुछ ही देर में उसकी मौत हो गई। यह एक दुर्घटना थी, लेकिन सऊदी कानून के तहत इस मामले में उन पर हत्या का आरोप लग गया।

मौत की सजा तक पहुंचा मामला
साल 2011 में सऊदी अदालत ने अब्दुल रहीम को फांसी की सजा सुनाई, जिसे बाद में अपील अदालतों ने भी बरकरार रखा। इस दौरान उनका जीवन पूरी तरह अंधकार में चला गया और उनका भविष्य अनिश्चित हो गया। सऊदी कानून के अनुसार, यदि पीड़ित परिवार मुआवजा यानी ‘ब्लड मनी’ स्वीकार कर ले, तो फांसी की सजा रोकी जा सकती है। वर्षों की कोशिशों के बाद पीड़ित परिवार 34 करोड़ रुपये के मुआवजे के लिए सहमत हुआ। यह रकम जुटाना किसी आम परिवार के लिए असंभव था, लेकिन केरल और दुनिया भर के मलयाली समुदाय ने मिलकर एक बड़ा क्राउडफंडिंग अभियान चलाया।

एक विशेष मोबाइल ऐप और सामाजिक सहयोग के जरिए सिर्फ कुछ ही दिनों में 34 करोड़ रुपये जुटा लिए गए। इस अभियान में प्रवासी भारतीयों, नेताओं और आम लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। अप्रैल 2024 में यह राशि सऊदी अदालत में जमा कर दी गई, जिसके बाद अब्दुल रहीम की फांसी की सजा रद्द कर दी गई।
हालांकि सजा माफ होने के बाद भी उन्हें अपनी जेल की निर्धारित अवधि पूरी करनी थी। हिजरी कैलेंडर के अनुसार उनकी सजा 20 मई 2026 को पूरी हुई, जिसके बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। रिहाई के बाद जब अब्दुल रहीम अपने घर पहुंचे, तो उनकी मां फातिमा उन्हें देखकर भावुक हो उठीं। यह पल सिर्फ एक परिवार की जीत नहीं था, बल्कि उनकी मां के सालों के इंतजार और अटूट विश्वास की जीत भी था।