नारी डेस्क : घर में नन्हा मेहमान आते ही माता-पिता के साथ दादी-नानी और परिवार के दूसरे सदस्य भी बच्चे की देखभाल को लेकर कई सुझाव देने लगते हैं। बच्चे को कब दूध देना है, कब नहलाना है और कब पानी देना है। इन बातों को लेकर कई तरह की मान्यताएं भी सुनने को मिलती हैं। लेकिन शिशु को पानी देने के मामले में विशेषज्ञों की सलाह काफी स्पष्ट है। पहले करीब 6 महीने तक स्वस्थ और पूर्ण अवधि में जन्मे शिशु को मां का दूध या उचित तरीके से तैयार किया गया फॉर्मूला मिल्क ही पर्याप्त तरल देता है। इस दौरान आमतौर पर अलग से पानी देने की जरूरत नहीं होती।
6 महीने तक बच्चे को पानी क्यों नहीं देना चाहिए?
पहले 6 महीने में शिशु की पोषण और तरल पदार्थों की जरूरत मुख्य रूप से मां के दूध से पूरी हो सकती है। मां के दूध में पानी के साथ बच्चे के विकास के लिए जरूरी पोषक तत्व भी मौजूद होते हैं। अगर बच्चा फॉर्मूला मिल्क पीता है, तो उसे भी पर्याप्त मात्रा में पानी और पोषण मिल सकता है, बशर्ते फॉर्मूला को पैकेट पर दिए निर्देशों के अनुसार सही अनुपात में तैयार किया जाए।

ज्यादा पानी नुकसान पहुंचा सकता है
छोटे शिशु की किडनी अभी पूरी तरह विकसित नहीं होती। इसलिए जरूरत से ज्यादा पानी देने से शरीर में सोडियम और अन्य इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बिगड़ सकता है। गंभीर स्थिति में पानी का अधिक सेवन हाइपोनेट्रेमिया यानी रक्त में सोडियम का स्तर बहुत कम होने का कारण बन सकता है। इसी तरह फॉर्मूला मिल्क में निर्देश से ज्यादा पानी मिलाकर उसे पतला करना भी सही नहीं है। इससे बच्चे को जरूरत के अनुसार पोषण नहीं मिल पाता और इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बिगड़ सकता है।
बच्चे को पानी देना कब शुरू करें?
आमतौर पर जब बच्चा लगभग 6 महीने की उम्र में ठोस आहार शुरू करता है, तब उसके भोजन के साथ थोड़ी मात्रा में पानी देना शुरू किया जा सकता है। शुरुआत में बच्चे को कप या उम्र के अनुसार उपयुक्त सिपर से थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पानी दिया जा सकता है। इस उम्र में भी मां का दूध या फॉर्मूला मिल्क बच्चे के आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहता है। बच्चे को पानी पिलाने के लिए बोतल की जगह कप से धीरे-धीरे पानी पीने की आदत डालना भी उपयोगी हो सकता है।

क्या 6 महीने के बाद बच्चे को बहुत ज्यादा पानी देना चाहिए?
नहीं। 6 महीने के बाद भी पानी की जरूरत धीरे-धीरे बढ़ती है। शुरुआत में बच्चा ठोस आहार के साथ थोड़ी मात्रा में पानी ले सकता है। उसकी कुल तरल जरूरत में मां का दूध या फॉर्मूला भी शामिल रहता है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है और ठोस आहार की मात्रा बढ़ती है, पानी की मात्रा भी धीरे-धीरे बढ़ाई जा सकती है।
कैसे पता चले कि बच्चा हाइड्रेटेड है?
बच्चे के हाइड्रेशन का अंदाजा केवल पानी पीने की मात्रा से नहीं लगाया जाता। पेशाब की आवृत्ति, उसका रंग, बच्चे का व्यवहार और बीमारी के लक्षण भी महत्वपूर्ण संकेत हैं। छोटे शिशु में पर्याप्त दूध मिलने का एक संकेत नियमित रूप से पेशाब करना हो सकता है। हालांकि हर बच्चे में पेशाब की संख्या अलग हो सकती है, इसलिए केवल “24 घंटे में 6-8 बार पेशाब” को ही पर्याप्त हाइड्रेशन का निश्चित पैमाना नहीं मानना चाहिए। अगर बच्चे का पेशाब बहुत कम हो जाए, मुंह सूख रहा हो, बच्चा असामान्य रूप से सुस्त लगे, रोने पर आंसू न आएं या सिर का मुलायम हिस्सा धंसा हुआ लगे, तो डिहाइड्रेशन की आशंका हो सकती है। ऐसी स्थिति में तुरंत बाल रोग विशेषज्ञ से संपर्क करें।

इन बातों का रखें खास ध्यान
6 महीने से कम उम्र के स्वस्थ शिशु को आमतौर पर अलग से पानी देने की जरूरत नहीं होती।
मां का दूध बच्चे के लिए पोषण और तरल दोनों का महत्वपूर्ण स्रोत है।
फॉर्मूला मिल्क हमेशा पैकेट पर दिए निर्देश के अनुसार सही मात्रा में पानी के साथ तैयार करें।
फॉर्मूला मिल्क को अधिक पानी डालकर पतला न करें।
6 महीने के आसपास ठोस आहार शुरू होने पर थोड़ी मात्रा में पानी देना शुरू किया जा सकता है।
बच्चा बीमार हो, उल्टी-दस्त हों या डिहाइड्रेशन के लक्षण दिखाई दें, तो खुद से पानी या कोई अन्य तरल देने के बजाय डॉक्टर की सलाह लें।
नोट: हर बच्चे की जरूरत अलग हो सकती है। समय से पहले जन्मे बच्चों या किसी स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे शिशुओं के लिए पानी और फीडिंग को लेकर बाल रोग विशेषज्ञ की सलाह को प्राथमिकता दें।