29 AUGSATURDAY2026 1:30:13 PM
Life Style

पिता को मानसिक बीमार बताकर कब्जे की कोशिश, हाई कोर्ट ने बेटे को ही फ्लैट से निकाला

  • Edited By Priya Yadav,
  • Updated: 29 Aug, 2026 10:41 AM
पिता को मानसिक बीमार बताकर कब्जे की कोशिश, हाई कोर्ट ने बेटे को ही फ्लैट से निकाला

नारी डेस्क:   मुंबई में पिता और बेटे के बीच शुरू हुआ संपत्ति का विवाद अब रिश्तों की कड़वाहट तक पहुंच गया। 78 साल के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी पिता के खिलाफ उनके 54 वर्षीय बेटे ने उनकी मानसिक स्थिति पर ही सवाल खड़े कर दिए। बेटे का कहना था कि पिता मानसिक रूप से बीमार हैं और अपने कानूनी मामलों को ठीक से संभालने की हालत में नहीं हैं। साथ ही, वह पिता के फ्लैट पर भी अपना हक जता रहा था। मामला जब बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचा तो तस्वीर कुछ और ही निकली। अदालत ने बेटे की दलीलों को खारिज करते हुए न सिर्फ उसकी याचिका ठुकरा दी, बल्कि उसे पिता के फ्लैट से ही बेदखल कर दिया।

संपत्ति विवाद के बीच मानसिक बीमारी का दावा

मामला मुंबई के अंधेरी इलाके में स्थित एक फ्लैट और पैतृक संपत्ति से जुड़े पुराने विवाद का है। 54 वर्षीय बेटे ने वर्ष 2015 में पैतृक संपत्ति के बंटवारे को लेकर अपने पिता के खिलाफ मुकदमा दायर किया था। यह मामला अभी भी लंबित है। इसी विवाद के दौरान दिसंबर 2025 में बेटे ने बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया और पिता की मानसिक स्थिति की जांच कराने के लिए मेडिकल बोर्ड गठित करने की मांग की। उसका दावा था कि उसके पिता मानसिक बीमारी से पीड़ित हैं और अपनी ओर से चल रहे विभिन्न दीवानी और आपराधिक मामलों को समझने या उनमें प्रभावी ढंग से पैरवी करने की स्थिति में नहीं हैं। बेटे ने अपनी मांग के समर्थन में जुलाई 2024 की एक मेडिकल रिपोर्ट का भी हवाला दिया। इसी रिपोर्ट को आधार बनाकर उसने पिता की मानसिक क्षमता पर सवाल उठाए और उनके फ्लैट पर अपना दावा भी जताया।

PunjabKesari

मेडिकल रिपोर्ट में मानसिक बीमारी का जिक्र नहीं

सुनवाई के दौरान अदालत ने जब बेटे की ओर से पेश किए गए मेडिकल दस्तावेजों को देखा तो उसमें मानसिक बीमारी की पुष्टि नहीं मिली। रिपोर्ट में पिता के मधुमेह से पीड़ित होने और इंसुलिन लेने के बाद हाइपोग्लाइसीमिया की समस्या होने का उल्लेख था। अदालत के मुताबिक, ब्लड शुगर बहुत कम होने की स्थिति में उन्हें कुछ समय के लिए भ्रम, उलझन, भूलने और पसीना आने जैसे लक्षण हो सकते थे। हालांकि मेडिकल सर्टिफिकेट में यह भी स्पष्ट था कि ये लक्षण अस्थायी होते हैं। पीठ ने इसी बिंदु को महत्वपूर्ण माना। अदालत ने कहा कि उपलब्ध मेडिकल रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि 78 वर्षीय पिता किसी मानसिक बीमारी से पीड़ित हैं या अपनी कानूनी कार्यवाही को समझने में असमर्थ हैं।

पिता ने भी बेटे को संपत्ति से हटाने की कार्रवाई की थी

इस पारिवारिक और संपत्ति विवाद में पिता की ओर से भी कानूनी कार्रवाई की गई थी। उन्होंने माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत बेटे को अपनी संपत्ति से हटाने की कार्यवाही शुरू की थी। हाई कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, पिता ने बेटे पर मानसिक उत्पीड़न करने का आरोप भी लगाया था। अदालत ने गौर किया कि जिस समय पिता को संपत्ति विवाद में राहत दिलाने की कार्यवाही आगे बढ़ रही थी, लगभग उसी दौरान बेटे ने उनकी मानसिक स्थिति की जांच कराने की मांग की। पीठ ने परिस्थितियों को देखते हुए माना कि मानसिक स्वास्थ्य कानून के तहत की गई यह मांग महज संयोग नहीं थी, बल्कि पिता पर दबाव बनाने की कोशिश का हिस्सा थी।

ये भी पढ़ें: खून गाढ़ा होने पर शरीर में नजर आते हैं ये बदलाव, इन्हें हल्के में न लें

'कानून ढाल है, तलवार नहीं'

अदालत ने बेटे की दलीलों पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को परेशान करने या उसके खिलाफ दबाव बनाने के लिए नहीं किया जा सकता। पीठ ने मानसिक स्वास्थ्य कानून के संदर्भ में स्पष्ट किया कि कानून एक सुरक्षा कवच है, किसी विरोधी पक्ष के खिलाफ इस्तेमाल की जाने वाली तलवार नहीं। अदालत ने माना कि बेटे ने अपने बुजुर्ग पिता को अनावश्यक मुकदमेबाजी में उलझाने की कोशिश की। पीठ ने इस पूरी कार्यवाही को दुर्भावनापूर्ण बताते हुए कहा कि मानसिक स्वास्थ्य कानून का इस तरह इस्तेमाल उसकी मूल भावना के खिलाफ है।

सौतेली मां को लेकर भी बेटे ने लगाए आरोप

सुनवाई के दौरान बेटे ने पिता की मानसिक क्षमता पर सवाल उठाने के साथ उनकी निजी परिस्थितियों को लेकर भी कई आरोप लगाए। उसने दावा किया कि उसके पिता अपनी डॉक्टर सौतेली मां के साथ अलग रहते हैं और उसे पिता से मिलने नहीं दिया जाता। बेटे ने यह भी कहा कि पिता के खिलाफ अलग-अलग दीवानी और आपराधिक मामले चल रहे हैं और उनकी मानसिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह इन मामलों में खुद प्रभावी ढंग से पैरवी कर सकें। हालांकि, हाई कोर्ट ने इन दावों को पिता की मानसिक बीमारी साबित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना। अदालत ने कहा कि केवल पारिवारिक विवाद, किसी सदस्य से अलग रहना या मुकदमों में शामिल होना किसी व्यक्ति को मानसिक रूप से बीमार साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

PunjabKesari

बेटे की याचिका खारिज, फ्लैट से भी बेदखली

सभी तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने पिता की मानसिक जांच कराने की मांग वाली बेटे की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने बेटे को पिता के फ्लैट से बेदखल करने का भी आदेश दिया। पीठ ने बेटे के आचरण को बेहद दुर्भावनापूर्ण बताते हुए उस पर 5 लाख रुपये की लागत लगाई। यह राशि उसे अपने पिता को देनी होगी।

अदालत के इस फैसले ने साफ कर दिया कि वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े प्रावधानों का इस्तेमाल संपत्ति विवाद में किसी बुजुर्ग पर दबाव बनाने के लिए नहीं किया जा सकता। 

 

Related News