नारी डेस्क: एक सर्वे से पता चला है कि मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोग अक्सर मदद लेने में हिचकिचाते हैं। आधे से ज़्यादा लोगों ने बताया कि उन्होंने प्रोफेशनल मदद लेने से पहले एक साल से ज़्यादा समय तक इंतज़ार किया। बुधवार को मेंटल हेल्थकेयर संस्था 'अमाहा' (Amaha) की ओर से जारी 'मेंटल हेल्थ रिपोर्ट 2026: भारत में देखभाल के सफर को समझना' के अनुसार, लगभग 56 प्रतिशत लोगों ने इलाज शुरू करने से पहले खुद को नुकसान पहुंचाने के विचारों का अनुभव किया।
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खुद को नुकसान पहुंचा रहे मरीज
मानसिक सेहत के बारे में जागरूकता बढ़ने के बावजूद, प्रोफेशनल मदद लेने वाले 53 प्रतिशत से ज़्यादा लोगों ने एक साल से ज़्यादा इंतज़ार किया। केवल 11.3 प्रतिशत लोग एक महीने के भीतर इलाज तक पहुंच पाए, जबकि 54.5 प्रतिशत ने पहले दोस्तों या परिवार से बात की और 44.6 प्रतिशत ने खुद से मदद करने की कोशिश की। ये नतीजे मानसिक समस्याओं से जूझ रहे 13,825 लोगों की प्रतिक्रियाओं पर आधारित हैं, जिनका अक्टूबर 2025 और सितंबर 2026 के बीच बेंगलुरु, मुंबई और दिल्ली में अमाहा के केंद्रों पर इलाज चल रहा था। सर्वे में शामिल 94.9 प्रतिशत लोगों ने एक साथ दो या उससे ज़्यादा समस्याओं का ज़िक्र किया, जिनमें एंग्जायटी (बेचैनी), तनाव और उदासी शामिल हैं, जबकि 56.2 प्रतिशत लोगों ने इलाज लेने से पहले खुद को नुकसान पहुंचाने के विचारों का अनुभव किया। इसके अलावा, खुद को नुकसान पहुंचाने के विचारों का अनुभव करने वालों में से 71.7 प्रतिशत छात्र थे।
दोस्त और परिवार को भी ध्यान में रखनी होगी ये बातें
मनोचिकित्सक और 'अमाहा' (Amaha) के संस्थापक और CEO डॉ. अमित मलिक ने कहा- "मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत की प्रगति को इस आधार पर नहीं मापा जाना चाहिए कि हम इस बारे में कितनी खुलकर बात करते हैं, बल्कि इस आधार पर देखा जाना चाहिए कि क्या लोगों को समय पर और असरदार इलाज मिल पा रहा है या नहीं। ये उन लोगों के अनुभव हैं जो हम तक पहुंचे, इनसे हमें यह सोचना चाहिए कि अभी भी कौन लोग इलाज तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। दोस्त, परिवार और समुदाय इलाज के पूरे सिस्टम का एक अहम हिस्सा हैं। वे लोगों को यह समझने में मदद करते हैं कि वे क्या महसूस कर रहे हैं, उन्हें किस तरह के सहारे की ज़रूरत है, और इलाज तक पहुंचने का रास्ता खोजने में भी मदद करते हैं,।
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लोगों की मुख्य पांच चिंताएं
उन्होंने कहा कि इलाज की कोशिश करने से किसी व्यक्ति के धैर्य या सहनशक्ति की परीक्षा नहीं होनी चाहिए। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि इलाज तक पहुंच को आसान बनाने के लिए डॉक्टरों, परिवारों और समुदायों को मिलकर काम करने की ज़रूरत है। रिपोर्ट में पाया गया कि 15.4 प्रतिशत लोगों ने प्रोफेशनल मदद लेने से पहले शराब या अन्य हानिकारक चीज़ों का इस्तेमाल किया था, और महिलाओं की तुलना में पुरुषों में ऐसा करने की संभावना ज़्यादा थी। जहां 82.7 प्रतिशत लोगों ने समस्याओं से बचने के लिए स्क्रीन पर ज़्यादा समय बिताने और ज़रूरत से ज़्यादा काम करने जैसे तरीके अपनाए, वहीं 43.1 प्रतिशत लोगों ने व्यायाम और जर्नल लिखने (डायरी में अपने विचार लिखना) जैसे बेहतर तरीके अपनाए। औसतन, लोगों की मुख्य पांच चिंताएं थीं: एंग्जायटी या घबराहट (72.1 प्रतिशत), इसके बाद तनाव (67.5 प्रतिशत), उदासी या खराब मूड (58.3 प्रतिशत), रिश्तों या आपसी बातचीत में दिक्कतें (55.6 प्रतिशत) और बार-बार मूड बदलना (54.1 प्रतिशत)।