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Anant Ambani ने मां Kamakhya मंदिर में दी कबूतर-बकरे की जीवित बलि, क्या है ये परंपरा?

  • Edited By Vandana,
  • Updated: 17 Jun, 2026 08:53 PM
Anant Ambani ने मां Kamakhya मंदिर में दी कबूतर-बकरे की जीवित बलि, क्या है ये परंपरा?

नारी डेस्कः अंबानी के बेटे अनंत अंबानी कितने धार्मिक हैं ये बात तो सब जानते ही है। इस समय वह असम के गुवाहाटी में स्थित मां कामाख्या  देवी के मंदिर पहुंचे जहां उन्होंने लोक परंपरा के अनुसार उन्होंने जीवित बलि देते हुए कबूतर उड़ाए और बकरा छोड़ा।

 कामाख्या मंदिर भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक हैं और इसे तंत्र साधना का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। इस मंदिर में देवी के यौनी स्वरूप की पूजा की जाती है जिसे सारे ब्रह्नांड के जन्म और जीवन का सूत्र माना जाता है। माता के इसी स्वरूप में देवी का रजपर्व मनाया जाता है जिसे अंबुवाची उत्सव कहते हैं। मान्यता के अनुसार, तीन दिनों के लिए माता कामाख्या मासिक धर्म में होती हैं। इस दौरान मंदिर के कपाट पूरी तरह से बंद रहते हैं। चौथे दिन देवी को स्नान कराकर मंदिर के कपाट खोले जाते हैं, जिसके बाद श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। मंदिर के कपाट खुलने पर भक्तों को 'अंगोदक' (पवित्र जल) और 'अंगवस्त्र' (लाल कपड़ा) दिया जाता है, जिसे शुभ और चमत्कारी माना जाता है। 
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अंबुवाची उत्सव-तंत्र साधना का महाकुंभ

इस मेले को 'तंत्र साधना का महाकुंभ' भी कहा जाता है। ये मंदिर तांत्रिक परंपरा का भी सिद्ध स्थान है और बहुत सी परंपराएं इस मंदिर से जुड़ी है। इन्हीं परंपराओं में से एक है कबूतर उड़ाना और बकरा छोड़ना, जिन्हें लोक-आस्थाओं का हिस्सा माना जाता है। लोग यहां मन्नत मांगने हैं या पूरी होने पर भेंट देने के रूप में कबूतर उड़ाते हैं और बकरा छोड़ते हैं। इस तरह ये दोनों जीव देवी को ही अर्पित कर दिए जाते हैं, जिसे जीवित अर्पण या जीवित बलि कहते हैं। इस बलि में कोई ना खून बहता है, कोई कष्ट और हिंसा नहीं होती इसलिए कामाख्या मंदिर जो कई तांत्रिक परंपराओं और बलि का गढ़ है, वहां ऐसी अहिंसक बलि भी एक सच है। 
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मन्नत और कपोत बलि से जुड़ी लोककथा

एक लोककथा भी इससे जुड़ी है कि एक दंपत्ति ने माता से संतान का आशीर्वाद मांगा था। जब संतान हुई तो वह अपनी मनौती पूरी करने के लिए मंदिर में कपोत बलि (कबूतर की बलि) देने आए। इस दौरान कबूतर के साथियों और उनके बच्चों की आवाज से पूरा परिसर गूंज उठा।  यह देखकर दंपति का कलेजा भर आया और उनकी आंख से आंसू निकल आए। कबूतर की बलि का विचार छोड़ उन्होंने ऐसे ही माता को समर्पित करते हुए उसे उड़ा दिया। इसके बाद से ये परंपरा चल रही है।
 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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ये भी मान्यता है कि पक्षियों को आज़ाद करना पुण्य का कार्य है औक कबूतर आपके शरीर से सारी नेगेटिविटी और सारी बाधाएं, रोग आदि अपने साथ ले जाते हैं। वहीं कामाख्या मंदिर में बकरे को भी ऐसे ही देवी को जीवित समर्पित कर दिया जाता है। कई लोग मानते हैं कि मनोकामना पूरी होने पर बकरे को छोड़ना भी एक प्रकार का धार्मिक व्रत पूरा करना है।

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