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मां वैष्णो देवी की अमर कहानी, आज भी कर रही हैं भगवान राम का इंतजार !

  • Edited By vasudha,
  • Updated: 20 Mar, 2026 05:09 PM
मां वैष्णो देवी की अमर कहानी, आज भी कर रही हैं भगवान राम का इंतजार !

नारी डेस्क: इन दिनों नवरात्रि के खास मौके पर माता वैष्णो देवी दरबार में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है।  माता वैष्णो देवी धाम देश के पवित्रतम धार्मिक स्थानों में से एक है। ये जम्मू में कटरा से करीब 14 किमी की दूरी पर त्रिकुटा पर्वत पर स्थित है वैष्णो देवी के शक्तिपीठ को सबसे दिव्य माना गया है। हालांकि बहुत कम लोग इस बात से अंजान है कि माता वैष्णो देवी का जन्म कैसे हुआ है,चलिए आज हम इस बारे में बताते हैं विस्तार से। 

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माता वैष्णो देवी का जन्म

कहा जाता है कि सतयुग में धरती पर धर्म और अच्छाई को पुनः स्थापित करने और बुराई का नाश करने के लिए देवताओं ने माता से प्रार्थना की थी। देवताओं की प्रार्थना पर माता लक्ष्मी, माता सरस्वती और माता काली ने अपनी शक्तियों को मिलाकर एक दिव्य कन्या को उत्पन्न किया यही थीं माता वैष्णो देवी। कथा के अनुसार, माता ने पृथ्वी पर रत्नाकर सागर नामक व्यक्ति के घर जन्म लिया, जो एक साधारण किसान थे। रतनाकर और उनकी पत्नी ने लंबे समय तक संतान सुख की इच्छा के लिए देवी की उपासना की थी। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर माता ने स्वयं उनकी पुत्री के रूप में जन्म लिया। रतनाकर ने अपनी पुत्री का नाम त्रिकुटा रखा, लेकिन वह बचपन से ही "वैष्णवी" के रूप में प्रसिद्ध हो गईं। वैष्णवी ने बचपन से ही ध्यान और तपस्या में गहरी रुचि दिखाई, और उनका उद्देश्य जीवन में केवल भक्ति और साधना करना था। बड़े होकर, उन्होंने भगवान विष्णु की भक्ति के मार्ग पर चलते हुए संसार से बुराइयों को दूर करने का संकल्प लिया।


भगवान विष्णु  का अवतार

कुछ मान्यताओं के अनुसार, वैष्णो देवी को भगवान विष्णु के सातवें अवतार राम का भी आशीर्वाद प्राप्त था। जब राम ने धरती पर अवतार लिया था, तब वैष्णो देवी ने उन्हें समर्पित होकर जीवन बिताने की इच्छा व्यक्त की थी। तब उनके अनुरोध करने पर भगवान राम ने उन्हें यह वचन दिया कि लंका से लौटते समय वह उनके पास आएंगे। अगर आप मुझे उस रूप में पहचान लेती हैं, तो मैं आपसे विवाह कर लूंगा। इसके बाद त्रिकुटा, प्रभु श्रीराम का इंतजार करने लगी। कहा जाता है कि वह आज भी भगवान का इंतजार कर रही हैं। 

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त्रिकुटा पर्वत से जुड़ी कथा

कहा जाता है कि माता वैष्णो देवी की कथा एक ब्राह्मण श्रीधर से जुड़ी है, जो कटरा के पास के गांव में रहते थे। एक दिन माता वैष्णो देवी श्रीधर के सपने में आईं और उन्हें अपने गांव में भंडारे का आयोजन करने के लिए कहा। श्रीधर ने सभी गांववालों और भक्तों को निमंत्रण दिया, लेकिन एक असुर भक्त भैरवनाथ भी वहां आ गया।  भैरवनाथ ने भंडारे में मांस और शराब की मांग की, जो कि वैष्णो देवी की आराधना के नियमों के विरुद्ध था। माता वैष्णो देवी ने भैरवनाथ को समझाने की कोशिश की, लेकिन जब वह नहीं माना, तो माता ने त्रिकुटा पर्वत की ओर जाने का निश्चय किया। 


भैरवनाथ को मिला वरदान

भैरवनाथ ने माता का पीछा किया। माता वैष्णो देवी ने त्रिकुटा पर्वत की एक गुफा में शरण ली। गुफा में रहने के दौरान माता ने हनुमान जी को बुलाकर कहा कि वह उनकी रक्षा करें। इसके बाद माता ने भैरवनाथ का अंत किया। कहा जाता है कि भैरवनाथ का सिर त्रिकुटा पर्वत के उस स्थान पर गिरा, जहां आज भैरवनाथ मंदिर है।  मृत्यु के समय भैरवनाथ ने माता से क्षमा मांगी। माता ने उसे क्षमा कर दिया और वरदान दिया कि जो भी श्रद्धालु वैष्णो देवी के दर्शन के लिए आएगा, वह भैरवनाथ के दर्शन भी जरूर करेगा, तभी उसकी यात्रा पूर्ण मानी जाएगी।


माता वैष्णो देवी की यात्रा का प्रारंभ

वैष्णो देवी ने स्वप्न में श्रीधर कोत्रिकुटा पर्वत पर गुफा में उनकी पिंडी खोजने का आदेश दिया। श्रीधर ने माता के आदेश का पालन करते हुए त्रिकुटा पर्वत पर यात्रा की और कठिन परिश्रम के बाद माता की गुफा का पता लगाया। उन्होंने गुफा में माता की पिंडी की स्थापना की और उनकी पूजा-अर्चना शुरू कर दी। श्रद्धालुओं के लिए माता वैष्णो देवी की यात्रा प्राचीन काल से ही शुरू हो चुकी थी, लेकिन इसका उल्लेख  महाभारत के समय से भी जुड़ा है। माना जाता है कि जब अर्जुन  को कुरुक्षेत्र युद्ध में विजय प्राप्त करनी थी, तो उन्होंने माता की आराधना की थी। माता ने अर्जुन को आशीर्वाद दिया और कहा कि जब भी उनके भक्त त्रिकुटा पर्वत की यात्रा करेंगे, उन्हें उनका आशीर्वाद मिलेगा।
 

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