15 SEPTUESDAY2026 12:59:12 PM
Nari

बुजुर्गों के लिए महामारी बन चुका है अकेलापन, परिवार के बीच रहकर भी हैं उदास

  • Edited By vasudha,
  • Updated: 15 Sep, 2026 12:01 PM
बुजुर्गों के लिए महामारी बन चुका है अकेलापन, परिवार के बीच रहकर भी हैं उदास

नारी डेस्क: बुजुर्गों में अकेलापन एक गंभीर लेकिन अक्सर नजरअंदाज की जाने वाली समस्या के रूप में उभर रहा है।  चिकित्सकों के अनुसार, बुजुर्ग परिवार के साथ रहते हुए भी खुद को अलग-थलग महसूस कर सकते हैं और लंबे समय तक सामाजिक संपर्क से दूर रहने से उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है। डॉक्टरों का कहना है कि अकेलापन केवल अकेले रहने से जुड़ी स्थिति नहीं है, बल्कि यह एक भावनात्मक अवस्था है जिसमें व्यक्ति खुद को दूसरों से कटा हुआ, उपेक्षित या सार्थक रिश्तों से वंचित महसूस करता है।


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इन लोगों को अकेलेपन का ज्यादा खतरा

डाक्टरों ने समझाया- ने कहा, ''कोई बुजुर्ग परिवार के साथ रहकर भी अकेलापन महसूस कर सकता है, जबकि अकेला रहने वाला व्यक्ति सामाजिक रूप से सक्रिय और दूसरों से जुड़ा रह सकता है। इसलिए यह आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कोई व्यक्ति अकेला रहता है या दूसरों के साथ।'' उन्होंने कहा कि बदलती पारिवारिक संरचना, शहरीकरण, शिक्षा और रोजगार के लिए युवाओं का दूसरे शहरों में पलायन तथा एकल परिवारों के बढ़ते चलन ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। जिन बुजुर्गों ने अपने जीवनसाथी को खो दिया है, जो अकेले रहते हैं, दिव्यांग हैं या किसी पुरानी बीमारी से जूझ रहे हैं, उनमें अकेलेपन का खतरा अधिक हो सकता है। सेवानिवृत्ति और बच्चों का दूसरे शहरों या देशों में चले जाना भी उनके सामाजिक संपर्क को कम कर सकता है।


बुजुर्गों के बदलावों पर रखें नजर

 दिल्ली एम्स के डॉक्टर ने कहा कि अकेलेपन को उम्र बढ़ने के स्वाभाविक परिणाम के बजाय स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सामाजिक जुड़ाव स्वस्थ आयु बढ़ने का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसके कम होने से बुजुर्गों की नींद, भूख, शारीरिक गतिविधि और मनोदशा पर भी असर पड़ सकता है। परिजनों को बुजुर्गों में होने वाले सूक्ष्म बदलावों पर ध्यान देना चाहिए, जैसे रोजमर्रा की गतिविधियों में रुचि कम होना, बातचीत कम करना या दिन का अधिकतर समय अकेले बिताना।  नियमित बातचीत, साथ बैठकर भोजन करना, बाहर घूमने जाना और परिवार के फैसलों में बुजुर्गों को शामिल करने से उनमें अपनापन और जीवन के उद्देश्य की भावना बहाल करने में मदद मिल सकती है।
 

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लगातार बढ़ रहा है तनाव

लंबे समय तक अकेलेपन का संबंध कई शारीरिक और संज्ञानात्मक स्वास्थ्य समस्याओं से पाया गया है।  अकेलेपन से जुड़ा लगातार तनाव नींद में कमी, उच्च रक्तचाप और हृदय संबंधी जोखिम बढ़ा सकता है, जबकि शारीरिक और सामाजिक गतिविधियां कम होने से पहले से मौजूद पुरानी बीमारियां बिगड़ सकती हैं। सामाजिक अलगाव और अकेलेपन का संबंध अवसाद, चिंता और संज्ञानात्मक क्षमता में गिरावट से होने के भी बढ़ते प्रमाण सामने आए हैं, इसलिए बुजुर्गों के स्वास्थ्य के व्यापक आकलन में उनके सामाजिक जुड़ाव की भी जांच शामिल होनी चाहिए। चिकित्सकों ने जोर देकर कहा कि यह समस्या केवल शहरों तक सीमित नहीं है।  व्यस्त शहरी जीवनशैली और पड़ोस में सीमित मेलजोल के कारण जहां बुजुर्ग अलग-थलग पड़ सकते हैं, वहीं रोजगार के लिए युवा पीढ़ी के पलायन से ग्रामीण इलाकों में रहने वाले बुजुर्गों को भी नियमित साथ और संगति नहीं मिल पाती। 
 

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