नारी डेस्क: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में ज्यादातर लोग अपनी फिटनेस, स्किन और वजन पर तो ध्यान देते हैं, लेकिन हड्डियों की सेहत को अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। यही लापरवाही आगे चलकर बड़ी परेशानी का कारण बन सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि हड्डियां अचानक कमजोर नहीं होतीं, बल्कि यह प्रक्रिया धीरे-धीरे होती है। कई बार व्यक्ति को लंबे समय तक कोई खास लक्षण महसूस नहीं होते और पहली बार मामूली चोट या हल्की-सी गिरावट में हड्डी टूटने के बाद ही समस्या का पता चलता है। ऐसे में समय रहते Bone Density Test (DEXA Scan) करवाकर हड्डियों की मजबूती का आकलन किया जा सकता है। इससे ऑस्टियोपोरोसिस जैसी गंभीर बीमारी का शुरुआती चरण में पता लगाकर समय पर इलाज शुरू किया जा सकता है।
हड्डियों की कमजोरी को नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी
अक्सर लोग तब तक हड्डियों की जांच कराने के बारे में नहीं सोचते, जब तक उन्हें तेज दर्द, कमर की समस्या या फ्रैक्चर जैसी परेशानी न हो जाए। लेकिन हकीकत यह है कि हड्डियों का घनत्व (Bone Density) कई साल पहले ही कम होना शुरू हो सकता है। आज के समय में बदलती लाइफस्टाइल, खराब खानपान, विटामिन डी और कैल्शियम की कमी, लंबे समय तक बैठकर काम करना और शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण कम उम्र के लोगों में भी हड्डियां कमजोर होने के मामले बढ़ रहे हैं। इसलिए सिर्फ बुजुर्ग ही नहीं, बल्कि जोखिम वाले युवाओं को भी समय-समय पर बोन हेल्थ की जांच करवानी चाहिए।

क्या होता है Bone Density Test?
मायो क्लिनिक के अनुसार, Bone Density Test एक ऐसी जांच है, जिससे यह पता लगाया जाता है कि आपकी हड्डियों में मिनरल्स, खासतौर पर कैल्शियम की मात्रा कितनी है और वे कितनी मजबूत हैं। इस जांच को Dual-Energy X-ray Absorptiometry (DEXA या DXA Scan) कहा जाता है। इस टेस्ट के जरिए मुख्य रूप से रीढ़ (Spine) और कूल्हे (Hip) की हड्डियों का बोन मिनरल डेंसिटी (BMD) मापा जाता है। रिपोर्ट के आधार पर डॉक्टर यह तय करते हैं कि हड्डियां सामान्य हैं, कमजोर हो रही हैं या ऑस्टियोपोरोसिस विकसित हो चुका है। सबसे अच्छी बात यह है कि इस जांच में बहुत कम मात्रा में एक्स-रे रेडिएशन का इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए इसे सुरक्षित माना जाता है।
DEXA Scan कैसे किया जाता है?
यूके की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (NHS) के अनुसार, DEXA Scan पूरी तरह दर्द रहित और नॉन-इनवेसिव जांच है। इसमें किसी तरह का इंजेक्शन, चीरा या एनेस्थीसिया नहीं दिया जाता। जांच के दौरान मरीज को एक सपाट टेबल पर लेटाया जाता है। इसके बाद DEXA मशीन शरीर के ऊपर से धीरे-धीरे गुजरती है और रीढ़ व कूल्हे की हड्डियों की तस्वीरें लेती है। पूरी प्रक्रिया लगभग 10 से 20 मिनट में पूरी हो जाती है और जांच के तुरंत बाद व्यक्ति अपनी सामान्य दिनचर्या शुरू कर सकता है।
रिपोर्ट में T-Score और Z-Score का क्या मतलब होता है
बोन डेंसिटी टेस्ट की रिपोर्ट में मुख्य रूप से T-Score और Z-Score दिए जाते हैं। यदि T-Score +1 से -1 के बीच है, तो हड्डियों को सामान्य माना जाता है। अगर -1 से -2.5 के बीच स्कोर आता है, तो इसे ऑस्टियोपीनिया (Osteopenia) कहा जाता है। इसका मतलब है कि हड्डियां कमजोर होना शुरू हो गई हैं और भविष्य में ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा बढ़ सकता है। वहीं -2.5 या उससे कम स्कोर होने पर इसे ऑस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis) माना जाता है। इस स्थिति में हड्डियां काफी कमजोर हो चुकी होती हैं और मामूली चोट में भी फ्रैक्चर होने का जोखिम बढ़ जाता है।

किन लोगों को जरूर करवाना चाहिए Bone Density Test
मेडलाइन प्लस के अनुसार हर व्यक्ति को यह जांच कराने की जरूरत नहीं होती, लेकिन कुछ लोगों में हड्डियां कमजोर होने का खतरा ज्यादा होता है। ऐसे लोगों को डॉक्टर की सलाह पर Bone Density Test जरूर करवाना चाहिए।
65 वर्ष या उससे अधिक उम्र की महिलाएं
बढ़ती उम्र के साथ महिलाओं में एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर कम होने लगता है, जिससे हड्डियां तेजी से कमजोर हो सकती हैं। इसलिए 65 वर्ष या उससे अधिक उम्र की महिलाओं को यह जांच करवाने की सलाह दी जाती है।
कम उम्र में मेनोपॉज होने वाली महिलाएं
यदि किसी महिला का मेनोपॉज 45 वर्ष से पहले हो गया हो या किसी कारणवश दोनों अंडाशय (Ovaries) निकाल दिए गए हों, तो उनमें ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा सामान्य महिलाओं की तुलना में अधिक होता है।
लंबे समय तक स्टेरॉयड दवाएं लेने वाले लोग
कुछ बीमारियों में महीनों तक स्टेरॉयड दवाओं का सेवन करना पड़ता है। ऐसी दवाएं हड्डियों को कमजोर कर सकती हैं। इसलिए ऐसे मरीजों को समय-समय पर बोन डेंसिटी टेस्ट कराने की सलाह दी जाती है।
50 वर्ष की उम्र के बाद बार-बार फ्रैक्चर होना
यदि 50 वर्ष की उम्र के बाद मामूली गिरने या हल्की चोट लगने पर भी हड्डी टूट जाए या एक से अधिक बार फ्रैक्चर हो चुका हो, तो यह ऑस्टियोपोरोसिस का संकेत हो सकता है। यदि माता-पिता या परिवार के किसी सदस्य को ऑस्टियोपोरोसिस रहा हो या कूल्हे की हड्डी का फ्रैक्चर हुआ हो, तो भविष्य में यह जोखिम बढ़ सकता है।
बहुत कम वजन वाले लोग
जिन लोगों का BMI सामान्य से काफी कम होता है, उनमें भी हड्डियों का घनत्व कम होने की संभावना अधिक रहती है। ऐसे लोगों को भी डॉक्टर की सलाह पर यह जांच करवानी चाहिए।
क्या हड्डियों का दर्द हमेशा ऑस्टियोपोरोसिस का संकेत होता है
जरूरी नहीं कि हर बार हड्डियों में दर्द का मतलब ऑस्टियोपोरोसिस ही हो। कई बार विटामिन डी की कमी, कैल्शियम की कमी, गठिया या दूसरी समस्याओं के कारण भी दर्द हो सकता है। वहीं दूसरी ओर, ऑस्टियोपोरोसिस कई वर्षों तक बिना किसी लक्षण के भी विकसित हो सकती है। इसलिए केवल दर्द के आधार पर बीमारी का अनुमान लगाना सही नहीं है।

हड्डियों को मजबूत रखने के लिए क्या करें
विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित रूप से कैल्शियम और विटामिन डी से भरपूर आहार लें, रोजाना हल्का व्यायाम या वेट-बेयरिंग एक्सरसाइज करें, धूम्रपान और अत्यधिक शराब से बचें तथा पर्याप्त धूप लें। यदि आप जोखिम वाले समूह में आते हैं, तो डॉक्टर की सलाह पर समय रहते Bone Density Test जरूर करवाएं।
समय पर जांच से बच सकता है फ्रैक्चर का खतरा
हड्डियों की कमजोरी हमेशा दर्द के रूप में सामने नहीं आती। कई बार पहली बार इसका पता तब चलता है, जब मामूली चोट में ही फ्रैक्चर हो जाता है। ऐसे में Bone Density Test हड्डियों की वास्तविक स्थिति जानने का सबसे भरोसेमंद तरीका माना जाता है। यदि आपकी उम्र बढ़ रही है, मेनोपॉज हो चुका है, लंबे समय से स्टेरॉयड दवाएं ले रहे हैं, परिवार में ऑस्टियोपोरोसिस का इतिहास है या बिना बड़ी चोट के हड्डी टूट चुकी है, तो डॉक्टर से इस जांच के बारे में जरूर सलाह लें। समय पर जांच और सही इलाज से हड्डियों को लंबे समय तक मजबूत रखा जा सकता है।