नारी डेस्क: सपनों की दुनिया हमेशा से रहस्य से भरी रही है। आखिर हम सपने क्यों देखते हैं? सपने देखते वक्त हमारे दिमाग में क्या चलता रहता है? और क्या नींद में रहते हुए भी इंसान बाहर की दुनिया से मिलने वाले संकेतों को समझ सकता है? इन सवालों के जवाब तलाशने में जुटे वैज्ञानिकों को अब कुछ बेहद दिलचस्प संकेत मिले हैं। नए शोधों से पता चला है कि इंसान सोते समय भी कुछ हद तक सोचने, सवालों का जवाब देने और यहां तक कि पहेलियां हल करने में सक्षम हो सकता है। इतना ही नहीं, सपने की अवस्था में मौजूद व्यक्ति आंखों या चेहरे के खास इशारों के जरिए बाहर मौजूद शोधकर्ताओं को जवाब भी दे सकता है।
सोते हुए व्यक्ति से कैसे किया गया संवाद
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की पोस्टडॉक्टरल शोधकर्ता करेन कोंकोली और उनकी टीम ने इस दिशा में एक खास प्रयोग किया। इसमें ऐसे लोगों को शामिल किया गया जो सो रहे थे और जिन्हें पहले से कुछ खास संकेतों का जवाब देने के लिए प्रशिक्षित किया गया था। प्रयोग के दौरान प्रतिभागियों को रोशनी, आवाज या कंपन जैसे बाहरी संकेत दिए गए। अगर सो रहा व्यक्ति सपने की अवस्था में होने के बावजूद संकेत को समझ पाता था, तो वह पहले से तय आंखों या चेहरे के हावभाव के जरिए जवाब देता था। इस तरह शोधकर्ताओं ने यह पता लगाने की कोशिश की कि नींद और सपने की अवस्था में दिमाग बाहरी दुनिया से कितनी जानकारी ग्रहण कर सकता है।

सिर पर इलेक्ट्रोड और उंगलियों में सेंसर
इस तरह के प्रयोगों में प्रतिभागी के सिर पर इलेक्ट्रोड लगी विशेष टोपी लगाई जाती है। इसके जरिए नींद के दौरान मस्तिष्क की गतिविधियों और अलग-अलग नींद की अवस्थाओं पर नजर रखी जाती है। साथ ही, उंगलियों या शरीर के दूसरे हिस्सों पर सेंसर लगाए जा सकते हैं, ताकि व्यक्ति की शारीरिक प्रतिक्रिया को रिकॉर्ड किया जा सके। शोधकर्ताओं का मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि जब कोई व्यक्ति सपना देख रहा होता है, तब उसका दिमाग पूरी तरह बाहरी दुनिया से कट जाता है या फिर किसी स्तर पर बाहर से आने वाली जानकारी को ग्रहण करके उसका जवाब भी दे सकता है।
क्या है ल्यूसिड ड्रीमिंग
इस शोध का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ल्यूसिड ड्रीमिंग है। आसान भाषा में कहें तो यह ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति सपने के दौरान यह समझ जाता है कि वह सपना देख रहा है। कुछ लोगों में इस अवस्था में सपने की घटनाओं या अपने व्यवहार को किसी हद तक नियंत्रित करने की क्षमता भी देखी गई है। ल्यूसिड ड्रीमिंग शब्द का इस्तेमाल पहली बार 1913 में प्रकाशित एक वैज्ञानिक शोधपत्र में किया गया था। इसके बाद से वैज्ञानिक इस खास अवस्था को समझने की कोशिश करते रहे हैं। उपलब्ध शोधों के अनुसार, बड़ी संख्या में लोग जीवन में कम से कम एक बार ल्यूसिड ड्रीम का अनुभव कर चुके हैं, जबकि कुछ लोग इसका नियमित अनुभव करने की बात कहते हैं।
सपने में गणित के सवालों का जवाब देने का दावा
सपनों को लेकर हुए प्रयोगों में सबसे दिलचस्प बात यह रही कि कुछ प्रतिभागियों ने सपने की अवस्था में रहते हुए गणित से जुड़े सवालों का जवाब देने में सक्षम होने के संकेत दिए। शोधकर्ताओं ने जवाब हासिल करने के लिए आंखों की पहले से तय गतिविधियों और दूसरे संकेतों का इस्तेमाल किया। नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर केन पॉलर से जुड़े हालिया शोध में भी इस बात की जांच की गई कि क्या सपने के दौरान व्यक्ति पहेली या समस्या को हल करने जैसी मानसिक गतिविधि कर सकता है। इन अध्ययनों ने इस संभावना को मजबूत किया है कि सपना देखते समय दिमाग पूरी तरह निष्क्रिय नहीं होता, बल्कि कुछ स्तर पर सोचने और जानकारी को प्रोसेस करने का काम जारी रख सकता है।
नींद में भी यादों को दोबारा प्रोसेस करता है दिमाग
हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के प्रोफेसर रॉबर्ट स्टिकगोल्ड के अनुसार, नींद के दौरान दिमाग दिनभर जमा हुई यादों और सूचनाओं को दोबारा प्रोसेस करता है। यही प्रक्रिया यादों को व्यवस्थित करने और उन्हें लंबे समय तक बनाए रखने में भूमिका निभा सकती है। इस नजरिए से देखें तो सपने केवल रात में दिखाई देने वाली बेतरतीब तस्वीरें नहीं हो सकते। इनके पीछे दिमाग में चल रही यादों, भावनाओं और सूचनाओं की प्रोसेसिंग का भी संबंध हो सकता है। हालांकि हर सपना क्यों आता है, इसका एक ही जवाब अभी तक वैज्ञानिकों के पास नहीं है।

हर सपने का मकसद एक जैसा नहीं हो सकता
शोधकर्ताओं का मानना है कि अलग-अलग सपनों के पीछे अलग-अलग मानसिक प्रक्रियाएं काम कर सकती हैं। डरावने सपने, रोजमर्रा की घटनाओं से जुड़े सपने या उड़ने जैसे अनुभव इन सभी को एक ही कारण से समझना संभव नहीं है। इसी वजह से वैज्ञानिक अब सपनों को केवल एक निष्क्रिय अनुभव मानने के बजाय यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि सपने के दौरान दिमाग किस तरह जानकारी लेता है, उसे प्रोसेस करता है और प्रतिक्रिया देता है।
अब बौद्ध भिक्षुओं पर होगा अध्ययन
इस शोध को आगे बढ़ाने के लिए प्रोफेसर केन पॉलर अब भूटान में बौद्ध भिक्षुओं पर अध्ययन करने की तैयारी कर रहे हैं। कुछ बौद्ध परंपराओं में साधना के दौरान सपनों के प्रति जागरूकता और ल्यूसिड ड्रीमिंग का अभ्यास किया जाता है। वैज्ञानिक यह जानना चाहते हैं कि लंबे समय से इस तरह की साधना करने वाले लोगों के सपनों और सामान्य लोगों के सपनों में क्या अंतर होता है। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि अभ्यास और मानसिक प्रशिक्षण का सपनों पर कितना असर पड़ता है।
मानसिक स्वास्थ्य और इलाज में मिल सकती है मदद
सपनों और नींद के दौरान दिमाग की गतिविधियों को समझने वाली यह रिसर्च भविष्य में कई क्षेत्रों के लिए उपयोगी हो सकती है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इससे याददाश्त, मानसिक स्वास्थ्य और दिमाग से जुड़ी कुछ समस्याओं को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी। हालांकि, इन प्रयोगों के आधार पर अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि सपनों के जरिए किसी बीमारी का इलाज संभव हो गया है। फिलहाल शोधकर्ताओं का ध्यान इस बात को समझने पर है कि नींद में दिमाग कितना सक्रिय रहता है और क्या सपने देखते समय व्यक्ति के साथ किसी तरह का विश्वसनीय संवाद स्थापित किया जा सकता है। आने वाले अध्ययनों से इस रहस्यमय मानसिक अवस्था के बारे में और जानकारी मिलने की उम्मीद है।
