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पुरानी गलतियों से सबक,  615 करोड़ का बजट... चंद्रयान-3 से जुड़ी ये बातें नहीं जानते होंगे आप

  • Edited By vasudha,
  • Updated: 26 Aug, 2023 12:39 PM
पुरानी गलतियों से सबक,  615 करोड़ का बजट... चंद्रयान-3 से जुड़ी ये बातें नहीं जानते होंगे आप

भारत बुधवार को चंद्रमा पर ‘सॉफ्ट लैंडिंग' करने वाला दुनिया का चौथा और इसके दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला दुनिया का पहला देश बन गया। चांद की सतह पर भारत से पहले पूर्ववर्ती सोवियत संघ, अमेरिका और चीन ही ‘सॉफ्ट लैंडिंग' कर पाए हैं। भारत का तीसरा चंद्र मिशन ‘चंद्रयान-3' बुधवार को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में उतरा। यह एक ऐसी जगह है जहां अब तक किसी अन्य देश का अंतरिक्ष यान नहीं उतरा है। हाल में रूस का ‘लूना 25' इस कोशिश के दौरान दुर्घटना का शिकार हो गया था। चलिए आज जानते हैं इस मिशन से जुड़ी दिलचस्प बातें जो शायद आप नहीं जानते होंगे।


मिशन का उद्देश्य 

चंद्रमा पर देश के दूसरे मिशन का उद्देश्य ऑर्बिटर में लगे उपकरणों के जरिए वैज्ञानिक अध्ययन करना, और चंद्रमा की सतह पर ‘सॉफ्ट लैंडिंग' की प्रौद्योगिकी और चंद्र सतह पर रोवर की चहलकदमी के प्रदर्शन का था। हालांकि, सात सितंबर, 2019 को एक सॉफ्टवेयर गड़बड़ी के कारण यह अंतरिक्ष यान चंद्रमा पर ‘सॉफ्ट लैंडिंग' करने में सफल नहीं हो पाया था। 

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मिशन पर लगे  615 करोड़

चंद्रयान-3 मिशन पर 615 करोड़ रुपये की लागत आई और 14 जुलाई को इसे प्रक्षेपण यान ‘लॉन्च व्हीकल मार्क-3' (एलवीएम-3) रॉकेट के जरिए प्रक्षेपित किया गया था। लैंडर और छह पहियों वाले रोवर (कुल वजन 1,752 किलोग्राम) को एक चंद्र दिवस की अवधि (धरती के लगभग 14 दिन के बराबर) तक काम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
 

लैंडर में लगे हैं कई सैंसर

 लैंडर में सुरक्षित रूप से चंद्र सतह पर उतरने के लिए कई सेंसर थे, जिसमें एक्सेलेरोमीटर, अल्टीमीटर, डॉपलर वेलोमीटर, इनक्लिनोमीटर, टचडाउन सेंसर और खतरे से बचने एवं स्थिति संबंधी जानकारी के लिए कैमरे लगे थे। 

 

विक्रम और प्रज्ञान का इतना है वजन

 लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) का कुल वजन 1,752 किलोग्राम है और जिन्हें चंद्रमा के वातावरण के अध्ययन के उद्देश्य से एक चंद्र दिवस अवधि (करीब 14 पृथ्वी दिवस) तक संचालन के लिए डिजाइन किया गया है।  लैंडर और रोवर के पास वैज्ञानिक पेलोड हें जो चांद की सतह पर प्रयोग करेंगे।

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वैज्ञानिकों का वेतन है बेहद कम

अंतरिक्ष एजेंसी के वैज्ञानिकों की पगार विकासित देशों के वैज्ञानिकों के वेतन का पांचवां हिस्सा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व प्रमुख जी माधवन नायर के मुताबिकइसरो में वैज्ञानिकों, तकनीशियनों और अन्य कर्मियों को जो वेतन भत्ते मिलते हैं वे दुनिया भर में इस वर्ग के लोगों को मिलने वाले वेतन भत्तों का पांचवा हिस्सा है।


‘विक्रम' और  प्रज्ञान नाम का मतलब

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक और भौतिक विज्ञानी विक्रम साराभाई को श्रद्धांजलि स्वरूप चंद्रयान-3 के लैंडर का नाम ‘विक्रम' रखा गया है।  'विक्रम' शब्द का अर्थ साहस और वीरता से जुड़ा है।  रोवर का नाम प्रज्ञान रखा गया है, जिसका मतलब है-  'बुद्धिमता' । रोवर को यह नाम इसलिए दिया गया है, क्योंकि वैज्ञानिकों का मानना है कि रोवर को अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करके चांद की सतह पर कई चीजों की जानकारी इकट्ठा करनी है। 

 

2008 में हुआ था पहला अभियान

 चंद्रयान -2 अपने अभियान में विफल रहा था, क्योंकि इसका लैंडर ‘विक्रम’ सात सितंबर, 2019 को लैंडिंग का प्रयास करते समय लैंडर के ब्रेकिंग सिस्टम में खराबी आ जाने के कारण सतह पर उतरने से कुछ मिनट पहले चंद्रमा की सतह पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। चंद्रयान का पहला अभियान 2008 में हुआ था। 

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पुरानी गलतियों से लिया सबक

चंद्रयान-2 में आई तकनीकी खामियों को दूर करते हुए लैंडर को अत्याधुनिक तकनीकों से लैस किया गया है। प्रोपल्शन मॉड्यूल, लैंडर और रोवर्स सात तरह के उपकरणों से लैस हैं. इनमें लैंडर पर चार, रोवर पर दो और प्रोपल्शन मॉड्यूल पर एक तकनीक शामिल है।


 रोवर में लगे हैं पहिये

चंद्रयान-2 की तरह ही चंद्रयान-3 में मुख्य घटक रोवर है। चंद्रयान-3 के रोवर का वजन केवल 26 किलोग्राम है, इसमें छह पहिए लगे हुए हैं। 91.7 सेमी लंबा, 75 सेमी चौड़ा और 39.7 सेमी ऊंचा, रोवर अपने छह पहियों की मदद से चंद्र सतह पर चलेगा.। छोटे आकार और अन्य चुनौतियों के चलते रोवर केवल लैंडर के साथ संचार कर सकता है.

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