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Periods के दर्द जैसा महसूस होता है कोलन कैंसर का दर्द, युवा महिलाओं में क्यों बढ़ रहे हैं इसके मामले

  • Edited By Priya Yadav,
  • Updated: 15 Jul, 2026 12:06 PM
Periods के दर्द जैसा महसूस होता है कोलन कैंसर का दर्द, युवा महिलाओं में क्यों बढ़ रहे हैं इसके मामले

नारी डेस्क: एक समय था जब कोलन कैंसर को केवल 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। हाल के वर्षों में 30 से 40 वर्ष की महिलाओं में भी कोलन (कोलोरेक्टल) कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे केवल आनुवंशिक कारण ही नहीं, बल्कि बदलती जीवनशैली, खराब खानपान, तनाव, मोटापा और शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करना भी बड़ी वजह बन रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, कोलन कैंसर के शुरुआती लक्षण कई बार इतने सामान्य होते हैं कि महिलाएं उन्हें पीरियड्स के दर्द, गैस, कब्ज या इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम (IBS) समझकर अनदेखा कर देती हैं। यही लापरवाही कई बार बीमारी की पहचान में देरी का कारण बन जाती है।

पीरियड्स के दर्द जैसा महसूस हो सकता है शुरुआती दर्द

 कम उम्र की महिलाओं में कोलन कैंसर की पहचान करना आसान नहीं होता क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण कई सामान्य बीमारियों से मिलते-जुलते हैं। लगातार पेट में ऐंठन, पेट फूलना, कब्ज, दस्त, मल त्याग की आदतों में बदलाव या पेट के निचले हिस्से में दर्द को अक्सर महिलाएं पीरियड्स का सामान्य दर्द या IBS समझ लेती हैं। ऐसे में डॉक्टर के पास पहुंचने में देरी हो जाती है और बीमारी आगे बढ़ सकती है।

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अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड बढ़ा सकते हैं खतरा

विशेषज्ञ बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में खानपान की आदतों में बड़ा बदलाव आया है। फास्ट फूड, प्रोसेस्ड स्नैक्स, इंस्टेंट मील, शुगरी ड्रिंक्स और प्रोसेस्ड मीट का बढ़ता सेवन आंतों की सेहत पर नकारात्मक असर डाल सकता है। ऐसे खाद्य पदार्थ शरीर में सूजन बढ़ाने, मोटापा बढ़ाने और गट माइक्रोबायोम का संतुलन बिगाड़ने का कारण बन सकते हैं, जिससे लंबे समय में कोलन कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है।

फाइबर की कमी भी बन सकती है वजह

स्वस्थ पाचन तंत्र के लिए फाइबर बेहद जरूरी माना जाता है। यह भोजन को आसानी से पचाने, आंतों की सफाई करने और हेल्दी गट बैक्टीरिया को बनाए रखने में मदद करता है। हालांकि, आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कई युवा महिलाएं पर्याप्त मात्रा में फाइबर नहीं ले पातीं। उनकी डाइट में पैकेज्ड फूड और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट अधिक होने के कारण फल, सब्जियां और साबुत अनाज जैसे फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ कम हो जाते हैं, जिससे जोखिम बढ़ सकता है।

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लंबे समय तक तनाव भी डालता है असर

हालांकि केवल तनाव कोलन कैंसर का सीधा कारण नहीं है, लेकिन लंबे समय तक मानसिक तनाव शरीर के कई सिस्टम को प्रभावित करता है। लगातार तनाव रहने से पाचन तंत्र प्रभावित होता है, गट बैक्टीरिया का संतुलन बिगड़ सकता है, सूजन बढ़ सकती है और नींद की गुणवत्ता भी खराब हो सकती है। इसके अलावा तनाव के कारण लोग अनियमित खानपान, जंक फूड और शारीरिक गतिविधियों से दूरी बनाने लगते हैं, जो कैंसर के जोखिम को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल हैं।

इन लक्षणों को भूलकर भी नजरअंदाज न करें

विशेषज्ञों के मुताबिक यदि लंबे समय तक पेट से जुड़ी समस्याएं बनी रहें तो उन्हें सामान्य मानकर टालना ठीक नहीं है। कुछ ऐसे लक्षण हैं जिन पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए

मल त्याग की आदतों में लगातार बदलाव

मल में खून आना

बिना वजह तेजी से वजन घटना

लगातार थकान महसूस होना

पेट में लगातार दर्द या ऐंठन

आयरन की कमी से एनीमिया

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मल त्याग के बाद भी पेट पूरी तरह साफ न होने का एहसास

कई महिलाएं सामाजिक झिझक की वजह से मल में खून आने जैसे लक्षण डॉक्टर को खुलकर नहीं बता पातीं, जिससे बीमारी की पहचान और इलाज में देरी हो जाती है।

सुस्त जीवनशैली और बढ़ता मोटापा भी जिम्मेदार

फिजिकल एक्टिविटी की कमी और मोटापा भी कोलोरेक्टल कैंसर के बढ़ते मामलों की प्रमुख वजहों में गिने जा रहे हैं। लंबे समय तक बैठकर काम करना, नियमित व्यायाम न करना और बढ़ता वजन आंतों की सेहत को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि रोजाना कम से कम 30 मिनट की शारीरिक गतिविधि, संतुलित आहार और स्वस्थ वजन बनाए रखना इस जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।

समय रहते पहचान ही सबसे बड़ा बचाव

विशेषज्ञों का कहना है कि 30 से 40 वर्ष की महिलाओं में कोलन कैंसर के बढ़ते मामलों के पीछे कोई एक कारण नहीं है। खराब खानपान, फाइबर की कमी, तनाव, मोटापा, निष्क्रिय जीवनशैली और शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करना मिलकर इस बीमारी का खतरा बढ़ा सकते हैं। यदि पेट से जुड़ी कोई समस्या लगातार बनी रहती है या ऊपर बताए गए लक्षण बार-बार दिखाई देते हैं, तो उन्हें केवल पीरियड्स का दर्द या IBS मानकर नजरअंदाज न करें। समय पर जांच और विशेषज्ञ की सलाह से बीमारी का जल्द पता लगाया जा सकता है, जिससे इलाज की सफलता की संभावना भी काफी बढ़ जाती है. 

 
 

 

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