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नाड़ी छूकर पकड़ लेते थे बीमारी, गांधी-नेहरू के थे निजी डॉक्टर, जानिए भारत रत्न बिधान चंद्र रॉय के बारे में

  • Edited By Priya Yadav,
  • Updated: 01 Jul, 2026 12:56 PM
नाड़ी छूकर पकड़ लेते थे बीमारी, गांधी-नेहरू के थे निजी डॉक्टर, जानिए भारत रत्न बिधान चंद्र रॉय के बारे में

नारी डेस्क:  हर साल 1 जुलाई को भारत में राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस मनाया जाता है। यह दिन सिर्फ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि देश के उन चिकित्सकों के योगदान को सम्मान देने का अवसर है, जो दिन-रात मरीजों की सेवा में लगे रहते हैं। इसी तारीख का एक खास ऐतिहासिक महत्व भी है यह भारत के महान चिकित्सक, शिक्षाविद, स्वतंत्रता सेनानी और राजनेता डॉ. बिधान चंद्र रॉय की जन्मतिथि और निधन तिथि दोनों है।

पटना में जन्म, लंदन तक का सफर

डॉ. बिधान चंद्र रॉय का जन्म 1 जुलाई 1882 को पटना में हुआ था। शुरुआती पढ़ाई उन्होंने पटना कॉलेज से पूरी की। इसके बाद चिकित्सा की पढ़ाई के लिए उन्होंने कलकत्ता मेडिकल कॉलेज का रुख किया। उच्च शिक्षा के लिए वे आगे लंदन गए, जहां उनका संघर्ष आसान नहीं था। सेंट बार्थोलोम्यू अस्पताल में प्रवेश पाने के लिए उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन अपनी लगन और मेहनत के दम पर उन्होंने अंततः एमआरसीपी (MRCP) और एफआरसीएस (FRCS) जैसी प्रतिष्ठित डिग्रियां हासिल कीं। उस समय यह उपलब्धि बेहद असाधारण मानी जाती थी।

भारत लौटकर चिकित्सा और समाज सेवा में योगदान

भारत लौटने के बाद डॉ. रॉय ने सिर्फ एक डॉक्टर के रूप में ही नहीं, बल्कि समाजसेवी और शिक्षाविद के रूप में भी अपनी पहचान बनाई। वे इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की स्थापना से जुड़े रहे और चिकित्सा क्षेत्र को संगठित करने में अहम भूमिका निभाई। उनकी पहचान तेजी से एक ऐसे डॉक्टर के रूप में बनी जो मरीजों को सिर्फ इलाज ही नहीं, बल्कि भरोसा भी देते थे। कहा जाता है कि वे मरीज का चेहरा और नाड़ी देखकर ही बीमारी का अंदाजा लगा लेते थे। हालांकि इसे उनकी असाधारण चिकित्सकीय क्षमता का प्रतीक माना जाता है, न कि आधुनिक चिकित्सा की वैज्ञानिक प्रक्रिया।

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महात्मा गांधी के निजी डॉक्टर भी रहे

डॉ. बिधान चंद्र रॉय का नाम देश के बड़े नेताओं से भी जुड़ा रहा। वे Mahatma Gandhi के बेहद करीबी सहयोगी और निजी डॉक्टर रहे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई और देश के राजनीतिक-समाजिक बदलावों में भाग लिया। 1931 में वे कलकत्ता के महापौर बने, जहां उन्होंने प्रशासनिक अनुभव के साथ जनसेवा को आगे बढ़ाया।

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पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के रूप में विकास की नई दिशा

स्वतंत्रता के बाद 1948 में उन्हें पश्चिम बंगाल का दूसरा मुख्यमंत्री बनाया गया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने राज्य के विकास की मजबूत नींव रखी। उनके कार्यकाल में स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा व्यवस्था और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण सुधार हुए। वे प्रशासन में सादगी और सेवा भावना के लिए जाने जाते थे। व्यक्तिगत जीवन में उन्होंने विवाह नहीं किया और अपना पूरा जीवन समाजसेवा को समर्पित कर दिया।

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नेहरू समेत कई बड़े नेताओं के डॉक्टर

डॉ. रॉय का संपर्क देश के शीर्ष नेतृत्व से भी रहा। वे Jawaharlal Nehru समेत कई प्रमुख हस्तियों के चिकित्सक रहे। उनकी चिकित्सा क्षमता और निर्णयों पर लोग गहरा भरोसा करते थे। 1961 में भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया। इसके ठीक एक साल बाद, 1 जुलाई 1962 को उनका निधन हो गया जो उनकी जन्मतिथि भी थी। यह संयोग आज भी लोगों के बीच उन्हें और अधिक यादगार बना देता है।

राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस का महत्व

1991 में भारत सरकार ने 1 जुलाई को राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस घोषित किया। यह दिन न सिर्फ डॉ. बिधान चंद्र रॉय के योगदान को याद करता है, बल्कि देश के सभी डॉक्टरों के समर्पण, मेहनत और मानवता की भावना को भी सलाम करता है।आज भी उनका जीवन यह संदेश देता है कि एक डॉक्टर सिर्फ इलाज करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज की सेवा करने वाला सच्चा मार्गदर्शक होता है।
 

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