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लक्ष्मण से नीम करोली बाबा तक का सफर, जानिए कैंची धाम की कहानी

  • Edited By Monika,
  • Updated: 04 Sep, 2026 05:07 PM
लक्ष्मण से नीम करोली बाबा तक का सफर, जानिए कैंची धाम की कहानी

नारी डेस्क : वो तस्वीरें और किस्से, जो शायद आपने कभी नहीं देखे होंगे—जब दुनिया उन्हें ‘महाराज जी’ कहने से पहले सिर्फ एक साधारण युवक के रूप में जानती थी। आज जब नीम करोली बाबा का नाम देश ही नहीं, दुनिया के कई हिस्सों में श्रद्धा और भक्ति के साथ लिया जाता है, तो उनके जीवन की शुरुआती कहानी और भी दिलचस्प लगती है। वह दौर, जब वे किसी बड़े आश्रम या प्रसिद्ध संत के रूप में नहीं, बल्कि एक साधारण परिवार में जन्मे लक्ष्मण नारायण शर्मा थे।

एक साधारण परिवार का लड़का, जिसकी राह असाधारण हो गई

लोकप्रिय जीवन-वृत्तांतों के अनुसार, नीम करोली बाबा का जन्म उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद क्षेत्र के अकबरपुर गांव में हुआ था। उनका शुरुआती जीवन एक सामान्य परिवार में बीता। किसी ने शायद तब कल्पना भी नहीं की होगी कि यही साधारण युवक आगे चलकर हजारों-लाखों श्रद्धालुओं के लिए ‘महाराज जी’ बन जाएगा और उनकी भक्ति की चर्चा भारत से लेकर विदेशों तक होगी। उनके जीवन से जुड़ी अनेक कथाएं आज भी उनके अनुयायियों के बीच सुनाई जाती हैं। इन्हीं कथाओं ने उनके व्यक्तित्व को रहस्यमय और आध्यात्मिक आभा से भर दिया।

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हनुमान जी के प्रति अटूट भक्ति

नीम करोली बाबा की पहचान भगवान हनुमान के अनन्य भक्त के रूप में की जाती है। उनके जीवन और शिक्षाओं में राम नाम और हनुमान भक्ति का विशेष स्थान बताया जाता है। उनसे जुड़े कई प्रमुख आश्रमों और मंदिरों में आज भी हनुमान जी की उपासना प्रमुख है। कैंची धाम, वृंदावन, ऋषिकेश और शिमला जैसे स्थानों पर उनकी आध्यात्मिक यात्रा और हनुमान भक्ति की छाप देखने को मिलती है। उनकी शिक्षाओं का सार अक्सर एक ही भावना में दिखाई देता है—राम नाम और सेवा। एक संत, कई नाम। समय और स्थान के साथ उन्हें अलग-अलग नामों से पुकारा गया। लक्ष्मण दास, हांडी वाले बाबा, टिकोनिया वाले बाबा और तलैया बाबा जैसे नामों का उल्लेख उनके जीवन से जुड़ी कथाओं में मिलता है। लेकिन इन नामों से उनकी पहचान कभी सीमित नहीं हुई। उनके अनुयायियों के लिए वे धीरे-धीरे ‘महाराज जी’ बन गए।

कैसे पड़ा ‘नीम करोली बाबा’ नाम?

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव नीब करौरी का नाम उनके जीवन से खास तौर पर जुड़ गया। कहा जाता है कि बाबा ने इस क्षेत्र में समय बिताया और उनकी आध्यात्मिक साधना से जुड़ी कई कथाएं यहां प्रचलित हैं। धीरे-धीरे इसी स्थान के नाम से उनकी पहचान नीम करोली बाबा के रूप में प्रसिद्ध हो गई।

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तीन बातें, जिनमें समाया था उनकी शिक्षाओं का सार

नीम करोली बाबा से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध शिक्षाओं को अक्सर तीन सरल बातों में याद किया जाता है
सबसे प्रेम करो — Love Everyone
सबकी सेवा करो — Serve Everyone
भगवान को याद रखो — Remember God
इन तीन संदेशों में प्रेम, सेवा और ईश्वर-स्मरण को जीवन का आधार माना गया है।

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भंडारा: भूखे को खाना खिलाना ही सेवा

नीम करोली बाबा के जीवन से जुड़ी कथाओं में भंडारे और भोजन सेवा का विशेष महत्व मिलता है। उनके लिए जरूरतमंद और भूखे व्यक्ति को भोजन कराना महज खाना खिलाना नहीं, बल्कि सेवा का एक रूप माना जाता था। आज भी कैंची धाम में होने वाले भंडारे और प्रसाद की परंपरा उनके अनुयायियों के बीच बेहद लोकप्रिय है।

कैंची धाम से दुनिया तक पहुंची उनकी पहचा

1960 के दशक में कैंची धाम उनके प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ। उत्तराखंड की पहाड़ियों में स्थित यह स्थान बाद में दुनियाभर से आने वाले श्रद्धालुओं और आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया। नीम करोली बाबा से प्रभावित होने वाले विदेशी अनुयायियों में राम दास, कृष्ण दास और लैरी ब्रिलियंट जैसे नामों का अक्सर उल्लेख किया जाता है। कहा जाता है कि स्टीव जॉब्स भी 1970 के दशक में भारत की यात्रा के दौरान कैंची धाम पहुंचे थे, हालांकि उस समय बाबा जीवित नहीं थे। बाद के वर्षों में मार्क जुकरबर्ग के भी कैंची धाम आने की बात सामने आई। इन यात्राओं ने नीम करोली बाबा और कैंची धाम की चर्चा को भारत से बाहर भी लोकप्रिय बनाने में भूमिका निभाई।

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शरीर चला गया, लेकिन संदेश आज भी जिंदा है

नीम करोली बाबा ने 1973 में अपना शरीर त्याग दिया, लेकिन उनके अनुयायियों की श्रद्धा आज भी कायम है। कैंची धाम में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या और उनके प्रति लोगों की आस्था इस बात की याद दिलाती है कि किसी संत की पहचान सिर्फ उनके जीवनकाल तक सीमित नहीं रहती। उनकी सबसे बड़ी विरासत शायद कोई भव्य इमारत या संपत्ति नहीं, बल्कि प्रेम, सेवा और ईश्वर-स्मरण का संदेश है।
क्योंकि उनका संदेश आज भी उतना ही सरल है
सबसे प्रेम करो।
सबकी सेवा करो।
भगवान को याद रखो।
और शायद यही वजह है कि समय बीतने के बावजूद उनके प्रति लोगों की आस्था कम नहीं हुई। जिस प्रेम और सेवा का संदेश उन्होंने दिया, उसकी गूंज आज भी कैंची धाम की पहाड़ियों में सुनाई देती है।

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