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Ahoi Ashtami: जानिए अहोई माता की पूजा में चांदी की माला का महत्व

  • Edited By neetu,
  • Updated: 06 Nov, 2020 05:27 PM
Ahoi Ashtami: जानिए अहोई माता की पूजा में चांदी की माला का महत्व

भारत में बहुत से व्रत व त्योहार मनाएं जाते हैं। ऐसे में ही करवाचौथ के 4 दिन बाद अहोई अष्टमी का पर्व आता है। इस दिन महिलाएं अपने बच्चों की लंबी उम्र के लिए अहोई देवी का व्रत रखती है। साथ ही जिन दंपत्तियों के संतान नहीं होती वे संतान के लिए व्रत रखती है। महिलाएं पूरा दिन निर्जला व्रत रखने के साथ ही सच्चे मन से देवी मां पूजा करती है। ऐसे में देवी मां प्रसन्न हो उनकी झोली संतान से भरती है। इस शुभ दिन पर खासतौर पर चांदी के मोतियों से माला तैयार कर देवी मां को चढ़ाई जाती है। तो चलिए जानते हैं इसे बारे में विस्तार से...

चांदी के मोतियों की माला 

कई जगहों पर महिलाएं चांदी के मोतियों से माला तैयार की जाती है। इसके लिए 2 चांदी के मोती लेकर उसे धागे में पिरोया जाता है। फिर उसे देवी मां को अर्पित कर पूजा की जाती है। उसके बाद माला को महिलाएं धारण करती है। फिर इस माला को किसी शुभ दिन पर उतार कर संभाल कर रख दिया जाता है। इसी तरह हर साल माला में 2 मोती पिरोए जाते हैं। साथ ही उसे पूरी विधि-विधान से धारण किया जाता है। 

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काला धागा 

बहुत-सी जगहों पर महिलाएं काले धागे से माला तैयार करती है। फिर उन धागों को अहोई देवी को चढ़ाकर पूजा की जाती है। उसके बाद उसे घर के लड़कों के गले में पहना दिया जाता है। इसी तरह हर साल पुराना धागा उतार कर नया धागा पहनाया जाता है। साथ ही पुराने धागे को बहते जल में प्रवाहित कर देते हैं। 

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दूध और चावल का भोग 

माना जाता है कि देवी मां को दूध और चावल से तैयार खीर का भोग लगाना शुभ होता है। 


- माना जाता है कि ऐसा करने से घर परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। 
- जिन लोगों की संतान नहीं होती है। उनकी झोली देवी मां पुत्र रत्न से भरती है। 
- परिवार के सदस्यों का बुरी नजर से बचाव रहता है। 

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तो चलिए जानते है व्रत रखने की विधि:

अहोई अष्टमी के व्रत को करवाचौथ के 4 दिन बाद रखा जाता है। इस दिन महिलाएं पूरा दिन निर्जला व्रत रखती है। फिर गोबर या कपड़े पर देवी मां का चित्र बनाया जाता है। साथ ही 8 बच्चों की तस्वीर भी बनाई जाती है। देवी मां को फूल चढ़ाकर रोटी, सब्जी और मिठाई का भोग लगाया जाता है। साथ ही उन्हें गन्ने की आक अर्पित की जाती है। फिर कथा व आरती पढ़कर देवी मां की पूजा की जाती है। शाम को तारे को देखकर व्रत को खोला जाता है। व्रत खोलने के लिए करवा में जल भर कर उससे तारे को अर्घ्य दिया जाता है।

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