नारी डेस्क: नवरात्रि का नाम सुनते ही उत्तर भारत में माता की चौकी, व्रत, गरबा, डांडिया, रामलीला और दशहरे पर रावण दहन की तस्वीर आंखों के सामने आ जाती है। लेकिन देश के दक्षिणी हिस्से में इसी त्योहार का रंग थोड़ा अलग नजर आता है। यहां नवरात्रि सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसमें कला, संगीत, परिवार, परंपराओं और स्थानीय संस्कृति की भी खास झलक देखने को मिलती है। कर्नाटक के भव्य मैसूर दशहरा से लेकर तमिलनाडु के घरों में सजाए जाने वाले ‘कोलु’ और केरल के विद्यारंभम तक, दक्षिण भारत में नवरात्रि की अपनी अलग पहचान है। इन परंपराओं में कहीं देवी शक्ति की आराधना होती है तो कहीं बच्चों को शिक्षा की पहली सीढ़ी पर ले जाया जाता है। आइए जानते हैं दक्षिण भारत के अलग-अलग राज्यों में नवरात्रि किस तरह मनाई जाती है।
मैसूर दशहरा: शाही अंदाज में नवरात्रि का उत्सव
कर्नाटक का मैसूर दशहरा दक्षिण भारत के सबसे प्रसिद्ध उत्सवों में से एक है। इसकी परंपरा का संबंध विजयनगर साम्राज्य से जोड़ा जाता है। नवरात्रि के दिनों में मैसूर शहर खास तौर पर सजाया जाता है और पूरे शहर में उत्सव का माहौल देखने को मिलता है।

जम्बो सवारी होती है खास आकर्षण
विजयादशमी के दिन यहां ‘जम्बो सवारी’ निकाली जाती है। सजे-धजे हाथियों के साथ निकलने वाला यह भव्य जुलूस मैसूर दशहरा की सबसे खास पहचान है। इसमें देवी चामुंडेश्वरी की प्रतिमा को विशेष रूप से सजाए गए हाथी पर विराजमान किया जाता है। यह शाही जुलूस मैसूर पैलेस से शुरू होकर बन्नूर रोड स्थित बन्नीमंतप क्षेत्र तक जाता है। रास्ते में बड़ी संख्या में लोग इस भव्य आयोजन को देखने के लिए जुटते हैं।
रोशनी से जगमगा उठता है मैसूर पैलेस
दशहरा के दौरान मैसूर पैलेस की सजावट देखने लायक होती है। महल को हजारों रोशनी से सजाया जाता है और शाम होते ही इसका नजारा बेहद खूबसूरत नजर आता है। इस दौरान संगीत, नृत्य और कई सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं, जिसकी वजह से देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग मैसूर पहुंचते हैं।
‘कोलु’ की खास परंपरा, घर बन जाता है छोटी सी प्रदर्शनी
तमिलनाडु और दक्षिण भारत के कुछ अन्य हिस्सों में नवरात्रि के दौरान ‘कोलु’ या ‘बोम्माई कोलु’ सजाने की परंपरा काफी लोकप्रिय है। इसमें घर के किसी खास हिस्से में सीढ़ीनुमा मंच तैयार किया जाता है। इन सीढ़ियों पर आमतौर पर 3, 5, 7, 9 या उससे अधिक पायदान बनाए जाते हैं। फिर इन पर देवी-देवताओं, पौराणिक पात्रों, संतों और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी छोटी-छोटी गुड़ियों को सजाया जाता है। कई घरों में रामायण और महाभारत के प्रसंगों को भी गुड़ियों के जरिए दिखाया जाता है। बच्चों को इस सजावट में खास दिलचस्पी होती है और कई परिवार हर साल नई गुड़ियां या नया प्रसंग जोड़ते हैं।

महिलाओं और पड़ोसियों को जोड़ता है कोलु
कोलु केवल घर की सजावट नहीं है। नवरात्रि के दौरान महिलाएं और बच्चे एक-दूसरे के घर जाकर कोलु देखते हैं। इस दौरान भजन और पारंपरिक गीत गाए जाते हैं। मेहमानों को प्रसाद और महिलाओं को ‘तांबूलम’ के रूप में उपहार देने की भी परंपरा है। इस तरह नवरात्रि का यह आयोजन परिवार, दोस्तों और पड़ोसियों को एक-दूसरे के करीब लाने का जरिया बन जाता है।
आयुध पूजा: काम के साधनों के प्रति कृतज्ञता
दक्षिण भारत में नवरात्रि के आखिरी दिनों में ‘आयुध पूजा’ का भी विशेष महत्व है। इस दिन लोग अपने काम से जुड़े औजारों और दूसरी जरूरी चीजों की साफ-सफाई करके उनकी पूजा करते हैं। घर में इस्तेमाल होने वाली चीजों से लेकर दुकानों और कार्यालयों में रखे उपकरणों तक को इस पूजा में शामिल किया जा सकता है। कई जगह किताबें, कंप्यूटर, संगीत वाद्ययंत्र, मशीनें, वाहन और काम में इस्तेमाल होने वाले औजारों की भी पूजा की जाती है। इसके पीछे एक सुंदर भाव है जिस चीज की मदद से हम अपना काम करते हैं और जीवन चलाते हैं, उसके प्रति सम्मान और आभार व्यक्त करना।
सरस्वती पूजा: ज्ञान और कला को समर्पित दिन
नवरात्रि के अंतिम दिनों में मां सरस्वती की पूजा का भी विशेष महत्व माना जाता है। किताबों, संगीत वाद्ययंत्रों और पढ़ाई-लिखाई से जुड़ी चीजों को पूजा में रखा जाता है। यह परंपरा ज्ञान, शिक्षा और कला के प्रति सम्मान को दर्शाती है। खासकर विद्यार्थियों और कलाकारों के लिए इन दिनों का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व काफी खास माना जाता है।

केरल में विद्यारंभम से शुरू होती है पढ़ाई की पहली सीढ़ी
केरल में विजयादशमी का दिन बच्चों की शिक्षा की शुरुआत के लिए बेहद शुभ माना जाता है। इस परंपरा को ‘विद्यारंभम’ कहा जाता है। इस दिन छोटे बच्चों को औपचारिक रूप से अक्षर ज्ञान कराया जाता है। आमतौर पर 2 से 3 साल की उम्र के बच्चों को इस रस्म में शामिल किया जाता है। मंदिरों या विद्वानों की मौजूदगी में बच्चे चावल या रेत पर अपनी उंगली से अक्षर लिखकर शिक्षा की शुरुआत करते हैं। कई जगह बच्चों को ‘ॐ हरि श्री गणपतये नमः’ लिखना सिखाया जाता है। माता-पिता के लिए यह पल बेहद भावुक और यादगार होता है, क्योंकि इसी दिन बच्चे की पढ़ाई की पहली शुरुआत मानी जाती है।
दक्षिण भारत की नवरात्रि है परंपरा और संस्कृति का संगम
दक्षिण भारत में नवरात्रि का उत्सव यह दिखाता है कि एक ही त्योहार देश के अलग-अलग हिस्सों में कितने अलग रंगों के साथ मनाया जा सकता है। कहीं मैसूर की शाही सवारी आकर्षण का केंद्र बनती है, तो कहीं घरों में सजे ‘कोलु’ लोगों को जोड़ते हैं। कहीं अपने काम के साधनों के प्रति आभार जताया जाता है तो केरल में बच्चों को शिक्षा की पहली सीढ़ी पर ले जाया जाता है। यही वजह है कि दक्षिण भारत की नवरात्रि सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि परिवार, कला, शिक्षा, संस्कृति और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं का खूबसूरत संगम भी है।