28 AUGFRIDAY2026 12:03:11 AM
Nari

मौत के बाद भी बांट सकते हो रोशनी, अब मृत्यु के 6 नहीं 12 घंटे तक भी हो सकता है नेत्रदान

  • Edited By vasudha,
  • Updated: 25 Aug, 2026 10:44 AM
मौत के बाद भी बांट सकते हो रोशनी, अब मृत्यु के 6 नहीं 12 घंटे तक भी हो सकता है नेत्रदान

नारी डेस्क:  मृत्यु के बाद नेत्रदान में कॉर्निया दान करना शामिल है, जिससे कॉर्निया की वजह से अंधेपन से जूझ रहे लोगों की दृष्टि वापस आ सकती है। मृतक दाता का कॉर्निया अंधे लोगों की दृष्टि लौटाने में मदद करता है। यह नेक काम जीवन की विरासत को आगे बढ़ाता है और नेत्रदान के महत्व को बढ़ावा देता है। इससे नेत्र प्राप्त करने वालों के लिए उम्मीद, सम्मान और एक उज्ज्वल भविष्य का निर्माण होता है। एक नए  अध्ययन में यह बात सामने आई है कि देहांत के 12 घंटे तक भी नेत्रदान किसी की जिंदगी रोशन कर सकता है। 
 

यह भी पढ़ें:  "मैं अपने परिवार की औरतों का साथ दूंगी..." कश्मीरा शाह ने इशारों- इशारों में गोविंदा को बताया गलत
 

मृत्यु के बाद नेत्रदान की प्रक्रिया

भारत में कॉर्निया से जुड़ी अंधापन दृष्टि खोने का एक बड़ा और ठीक हो सकने वाला कारण है, और हर साल इसके हज़ारों नए मामले सामने आते हैं। फिर भी, संभावित दानदाताओं में से बहुत कम लोगों की ही आंखें अंततः काम में लाई जाती हैं। मृत्यु के बाद नेत्रदान की प्रक्रिया सरल और सम्मानजनक होती है।  देहांत होने के बाद सामान्य तौर पर छह घंटे के भीतर नेत्रदान में मिले कॉर्निया का प्रत्यारोपण में इस्तेमाल बेहतर होता है। इसलिए छह घंटे के भीतर कॉर्निया दान को बढ़ावा दिया जाता है। लेकिन, देहांत के 12 घंटे के बाद भी नेत्रदान से दृष्टिवाधित लोगों की आंखों को रोशनी मिल सकती है। मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज (एमएएमसी) के गुरुनानक नेत्र केंद्र के डॉक्टरों द्वारा किए गए अध्ययन में यह बात सामने आई है। यह अध्ययन इंडियन जर्नल ऑफ ऑप्थेल्मोलॉजी में प्रकाशित भी हुआ है।


 170 लोगों पर किया गया अध्यन्न

अस्पताल के डॉक्टरों ने देहांत के बाद 170 लोगों के नेत्रदान से मिले 333 कॉर्निया पर यह अध्ययन किया। इसमें 163 डोनर के दोनों आंखों के कॉर्निया व सात डोनर के सिर्फ एक-एक कॉर्निया का दान हुआ था। इसमें पांच वर्ष से लेकर 102 वर्ष की उम्न तक के डोनर शामिल थे। इनमें से ज्यादातर डोनर की मौत हादसों के कारण हुई थी और नेत्रदान में करीब 14 घंटा समय लगा।  अध्ययन में पाया गया कि देहांत के 12 घंटे से अधिक समय के बाद कॉर्निया दान होने पर भी 75.68 प्रतिशत कॉर्निया प्रत्यारोपण के योग्य पाया गया और इसका सफलतापूर्वक प्रत्यारोपण किया गया। यह राष्ट्रीय स्तर पर दान में मिले कॉर्निया के प्रत्यारोपण में उपयोग से ज्यादा है। सिर्फ 23.32 प्रतिशत कॉर्निया प्रत्यारोपण योग्य नहीं था।  अध्ययन के मुताबिक, सिर्फ तीन प्रतिशत कॉर्निया का संक्रमण के कारण इस्तेमाल नहीं हो पाया। प्रत्यारोपण के नतीजे भी अच्छे रहे। 
 

यह भी पढ़ें:  क्या सच में Driving के दौरान गाने सुनने से हो रहे हैं Road Accident ? यहां समझिए पूरी बात 


कैसे निकाली जाती है आंख? 

कॉर्निया और स्क्लेरा (आँख का सफ़ेद हिस्सा), दोनों का ही प्रत्यारोपण (ट्रांसप्लांट) के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। आंखें निकालते समय या तो सिर्फ़ कॉर्निया का हिस्सा (कॉर्नियल बटन) या पूरी आंख निकाली जा सकती है। इससे चेहरे का रूप नहीं बिगड़ता क्योंकि मेडिकल टीम आंख के सॉकेट में एक प्लास्टिक का शेल (खोल) लगा देती है, जिससे चेहरा प्राकृतिक दिखता है। आंखें निकालने की प्रक्रिया सुरक्षित और सम्मानजनक होती है, और इसमें आमतौर पर 12-15 मिनट लगते हैं। दान की गई कॉर्निया को प्रत्यारोपण सर्जरी के लिए सुरक्षित रखा जाता है। इसके बाद डॉक्टर उन्हें दृष्टि वापस पाने का इंतज़ार कर रहे उपयुक्त मरीज़ों से मिलाते हैं। जो परिवार मृत्यु के बाद नेत्रदान का समर्थन करते हैं, वे एक नेक काम में योगदान देते हैं; वे दृष्टि का अनमोल उपहार देकर सीधे तौर पर लोगों की ज़िंदगी बदलते हैं।

Related News