नारी डेस्क: राजस्थान में महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर एक गंभीर तस्वीर सामने आई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की 54.4 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया (खून की कमी) से पीड़ित हैं। यानी इस आयु वर्ग की हर दूसरी महिला के शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर सामान्य से कम है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इस समस्या पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया, तो इसका असर महिलाओं के स्वास्थ्य के साथ-साथ मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है।
गर्भवती महिलाओं में भी गंभीर स्थिति
एनीमिया का असर सबसे अधिक गर्भवती महिलाओं पर देखा जा रहा है। गर्भावस्था के दौरान शरीर में पर्याप्त हीमोग्लोबिन न होने से मां और गर्भस्थ शिशु दोनों के स्वास्थ्य पर खतरा बढ़ जाता है। कई मामलों में प्रसव के दौरान जटिलताएं बढ़ जाती हैं और रक्त चढ़ाने की आवश्यकता तक पड़ जाती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच, संतुलित आहार और समय पर उपचार बेहद जरूरी है।
आदिवासी क्षेत्रों में हालात और ज्यादा चिंताजनक
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक, राजस्थान के अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय की 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की 61.6 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से प्रभावित हैं। आदिवासी बहुल जिलों में यह स्थिति और भी गंभीर है। डूंगरपुर जिले में एनीमिया से पीड़ित महिलाओं का प्रतिशत 72.6 फीसदी दर्ज किया गया है, जो राज्य के औसत से काफी अधिक है। यह आंकड़ा बताता है कि आदिवासी क्षेत्रों में पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
डूंगरपुर में हजारों गर्भवती महिलाओं में मिला गंभीर एनीमिया
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 के बीच डूंगरपुर जिले में 34,304 गर्भवती महिलाओं की जांच की गई। इनमें 3,152 महिलाओं में गंभीर एनीमिया पाया गया। इन महिलाओं का हीमोग्लोबिन स्तर 7 ग्राम प्रति डेसीलीटर से भी कम था, जिसे चिकित्सकीय दृष्टि से बेहद गंभीर स्थिति माना जाता है। ऐसे मामलों में प्रसव के दौरान जटिलताओं का खतरा काफी बढ़ जाता है।
उपचार के लिए बड़ी मात्रा में चढ़ाया गया रक्त
इसी अवधि के दौरान डूंगरपुर मेडिकल कॉलेज एवं उससे संबद्ध अस्पतालों में 5,390 यूनिट रक्त और रक्त अवयव उपलब्ध कराए गए। इनमें से 1,662 यूनिट रक्त का उपयोग गंभीर एनीमिया से पीड़ित गर्भवती महिलाओं के उपचार और प्रसव संबंधी आवश्यकताओं के लिए किया गया। इससे स्पष्ट है कि जिले में एनीमिया की गंभीरता स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी अतिरिक्त दबाव डाल रही है।
लोकसभा में उठा मुद्दा
बांसवाड़ा-डूंगरपुर से सांसद राजकुमार रोत ने लोकसभा में इस गंभीर विषय को उठाया। उनके सवाल के जवाब में केंद्र सरकार ने डूंगरपुर जिले में एनीमिया की स्थिति, जांच और उपचार से जुड़े आंकड़े साझा किए। सरकार की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी ने राज्य में महिलाओं के स्वास्थ्य की चुनौती को एक बार फिर उजागर कर दिया है।
एनीमिया के पीछे क्या हैं प्रमुख कारण
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, एनीमिया की सबसे बड़ी वजह पोषण की कमी, आयरन युक्त भोजन का पर्याप्त सेवन न करना, फोलिक एसिड और अन्य पोषक तत्वों की कमी तथा स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता का अभाव है। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में आर्थिक और सामाजिक कारणों से महिलाओं को संतुलित आहार नहीं मिल पाता, जिससे शरीर में आयरन की कमी हो जाती है। इसका सीधा असर हीमोग्लोबिन के स्तर पर पड़ता है।
कितना होना चाहिए हीमोग्लोबिन
चिकित्सकों के अनुसार, सामान्य तौर पर महिलाओं में हीमोग्लोबिन का स्तर 12 से 16 ग्राम प्रति डेसीलीटर के बीच होना चाहिए। लेकिन कई ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाली गर्भवती महिलाओं में यह स्तर काफी कम पाया जा रहा है। गंभीर मामलों में सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित करने के लिए पहले रक्त चढ़ाना पड़ता है।महिलाएं ही नहीं, बच्चे और पुरुष भी प्रभावित विशेषज्ञों का कहना है कि जनजातीय क्षेत्रों में एनीमिया केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है। बच्चों और पुरुषों में भी खून की कमी की समस्या तेजी से सामने आ रही है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरे समुदाय के पोषण और स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा है।
कई योजनाएं चल रही हैं, फिर भी चुनौती बरकरार
राज्य और केंद्र सरकार की ओर से एनीमिया की रोकथाम के लिए आयरन-फोलिक एसिड की गोलियों का वितरण, नियमित स्वास्थ्य जांच, स्क्रीनिंग और उपचार जैसी कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं। इसके बावजूद मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि राजस्थान में महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए एनीमिया अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल योजनाएं चलाना पर्याप्त नहीं है। पोषण संबंधी जागरूकता बढ़ाने, संतुलित आहार की उपलब्धता सुनिश्चित करने और समय पर स्वास्थ्य जांच को प्राथमिकता देने से ही इस समस्या पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है।