नारी डेस्क: आने वाले समय में किसी व्यक्ति की स्वास्थ्य जांच के लिए हर बार खून की जांच, एक्स-रे या अन्य महंगे परीक्षणों की जरूरत नहीं पड़ सकती। वैज्ञानिक ऐसी तकनीक पर तेजी से काम कर रहे हैं, जिसकी मदद से केवल 30 सेकंड की आवाज की रिकॉर्डिंग के जरिए कई गंभीर बीमारियों के शुरुआती संकेतों का पता लगाया जा सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक आसान, सुलभ और किफायती बना सकती है।
कई गंभीर बीमारियों के शुरुआती संकेत मिल सकते हैं
शोधकर्ताओं के अनुसार, किसी व्यक्ति की बोलने की शैली, आवाज की गुणवत्ता और सांस लेने के तरीके में होने वाले बदलाव कई स्वास्थ्य समस्याओं की ओर इशारा कर सकते हैं। 30 सेकंड की बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग के विश्लेषण से अल्जाइमर, पार्किंसंस, हृदय रोग, तनाव और अन्य न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के शुरुआती संकेत मिलने की संभावना है। इससे समय रहते बीमारी की पहचान कर इलाज शुरू करने में मदद मिल सकती है।

अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने तैयार किया नया मानक
वॉइस बायोमार्कर तकनीक पर दुनिया भर में कई वर्षों से शोध किया जा रहा है, लेकिन अलग-अलग देशों और संस्थानों में इसके मूल्यांकन के तरीके अलग होने के कारण एक समान मानक की कमी महसूस की जा रही थी। इसी चुनौती को दूर करने के लिए उत्तरी अमेरिका और यूरोप के 24 विशेषज्ञों ने मिलकर पहली बार आवाज आधारित स्वास्थ्य मापन के लिए एक मानकीकृत और सर्वसम्मत ढांचा तैयार किया है। यह ढांचा भविष्य में इस तकनीक के विकास और चिकित्सा क्षेत्र में इसके व्यापक उपयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
चार स्तरों पर होगी आवाज की जांच
विशेषज्ञों द्वारा तैयार किए गए इस नए ढांचे में आवाज से मिलने वाले स्वास्थ्य संकेतों को चार प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया गया है, ताकि किसी व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक स्थिति का अधिक सटीक आकलन किया जा सके।
सांसों की आवाज पर रहेगा विशेष ध्यान
इस स्तर पर यह देखा जाएगा कि व्यक्ति की सांस लेने की आवाज कैसी है, बोलते समय वह कितनी बार सांस लेने के लिए रुकता है और खांसी की आवाज में कोई असामान्यता तो नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे संकेत फेफड़ों की क्षमता, सांस की मांसपेशियों की कमजोरी या श्वसन संबंधी समस्याओं की जानकारी दे सकते हैं।
वॉइस बॉक्स की गुणवत्ता का होगा विश्लेषण
इस चरण में आवाज की पिच, स्पष्टता और स्थिरता का मूल्यांकन किया जाएगा। आवाज में आने वाले बदलाव कई बार गले, स्वरयंत्र या तंत्रिका तंत्र से जुड़ी समस्याओं का संकेत हो सकते हैं। इसलिए इन पहलुओं का विश्लेषण भी महत्वपूर्ण माना गया है।
उच्चारण से मिलेंगे न्यूरोलॉजिकल संकेत
नई प्रणाली में व्यक्ति के उच्चारण का भी बारीकी से अध्ययन किया जाएगा। इसमें जीभ, होंठ और तालू के बीच तालमेल को परखा जाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि एएलएस (Amyotrophic Lateral Sclerosis) जैसी बीमारियों में सबसे पहले शब्दों का स्पष्ट उच्चारण प्रभावित होने लगता है। ऐसे बदलावों की शुरुआती पहचान इलाज में मददगार साबित हो सकती है।
भाषा और बोलने के तरीके का भी होगा आकलन
आवाज के साथ-साथ व्यक्ति के शब्दों के चयन, वाक्य बनाने की शैली, बोलने की गति और लहजे का भी विश्लेषण किया जाएगा। ये संकेत मानसिक स्वास्थ्य, याददाश्त और मस्तिष्क से जुड़ी कई बीमारियों की पहचान में उपयोगी हो सकते हैं।

भारत में इस तकनीक से क्या होगा फायदा?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे विशाल देश में यह तकनीक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है। दूर-दराज के गांवों और छोटे कस्बों में रहने वाले लोग मोबाइल फोन के जरिए अपनी आवाज रिकॉर्ड कर शुरुआती स्वास्थ्य संकेत प्राप्त कर सकेंगे। जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की पहुंच सीमित है, वहां यह तकनीक शुरुआती स्क्रीनिंग का प्रभावी माध्यम बन सकती है। साथ ही कम लागत में स्वास्थ्य जांच की सुविधा मिलने से अधिक लोगों को समय रहते बीमारी की पहचान और उपचार का लाभ मिल सकेगा।
भविष्य की स्वास्थ्य सेवाओं में अहम भूमिका निभा सकती है तकनीक
विशेषज्ञों का मानना है कि आवाज आधारित स्वास्थ्य जांच पारंपरिक मेडिकल परीक्षणों का पूरी तरह विकल्प नहीं होगी, लेकिन शुरुआती स्क्रीनिंग और जोखिम की पहचान के लिए यह एक उपयोगी तकनीक साबित हो सकती है। यदि आने वाले वर्षों में इसके परिणाम लगातार सफल रहते हैं, तो मरीज केवल कुछ सेकंड की आवाज रिकॉर्ड कर अपने स्वास्थ्य से जुड़े महत्वपूर्ण संकेत प्राप्त कर सकेंगे।