नारी डेस्क: धनतेरस का त्योहार आते ही लोगों के मन में सोने-चांदी, बर्तन और नई चीजों की खरीदारी का ख्याल आने लगता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस पर्व का संबंध सिर्फ धन और समृद्धि से नहीं, बल्कि अच्छी सेहत और लंबी उम्र से भी है? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर भगवान धन्वंतरि समुद्र मंथन से प्रकट हुए थे। उस समय उनके हाथों में अमृत से भरा कलश था। इसी वजह से धनतेरस को धन्वंतरि जयंती के रूप में भी मनाया जाता है और इस दिन उनकी विशेष पूजा की जाती है। लेकिन सवाल यह है कि भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर ही क्यों प्रकट हुए थे? इसके पीछे समुद्र मंथन की एक रोचक पौराणिक कथा है।
समुद्र मंथन से कैसे प्रकट हुए भगवान धन्वंतरि
पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन करने का फैसला किया। इसका मुख्य उद्देश्य समुद्र से अमृत प्राप्त करना था, ताकि देवता उसे पीकर अमर हो सकें। समुद्र मंथन के लिए मंदराचल पर्वत को मथनी और नागराज वासुकि को रस्सी बनाया गया। भगवान विष्णु ने कच्छप अवतार धारण करके अपनी पीठ पर मंदराचल पर्वत को सहारा दिया, जिससे मंथन का काम पूरा हो सके। समुद्र मंथन के दौरान एक के बाद एक कई दिव्य रत्न और वस्तुएं बाहर निकलीं। इनमें माता लक्ष्मी, ऐरावत हाथी, उच्चैःश्रवा घोड़ा, कौस्तुभ मणि और कल्पवृक्ष जैसी दिव्य चीजें शामिल थीं। इसी दौरान समुद्र से भयंकर विष भी निकला, जिसे संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण कर लिया। इसके बाद देवताओं और असुरों ने फिर से समुद्र मंथन शुरू किया।

हाथों में अमृत कलश लेकर ही क्यों आए भगवान धन्वंतरि
श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध के आठवें अध्याय में भगवान धन्वंतरि के प्रकट होने का प्रसंग मिलता है। कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए। उनके हाथों में अमृत से भरा हुआ कलश था। यही भगवान धन्वंतरि थे, जिन्हें भगवान विष्णु का अंश माना जाता है। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का देवता और चिकित्सा का अधिष्ठाता माना जाता है। उनके हाथ में मौजूद अमृत कलश का भी विशेष धार्मिक महत्व है। पौराणिक मान्यताओं में अमृत को ऐसा दिव्य पेय बताया गया है, जिसे पीने से अमरता प्राप्त होती है। वहीं, आयुर्वेद का उद्देश्य शरीर को स्वस्थ रखना और बीमारियों से बचाव करना है। इसी मान्यता के आधार पर भगवान धन्वंतरि का अमृत कलश लेकर प्रकट होना जीवन, स्वास्थ्य और लंबी उम्र का प्रतीक माना जाता है। इसका संदेश यह भी है कि जीवन में धन-दौलत के साथ अच्छी सेहत का होना भी बेहद जरूरी है।
असुरों ने छीन लिया था अमृत से भरा कलश
पौराणिक कथा के अनुसार, जैसे ही भगवान धन्वंतरि अमृत से भरा कलश लेकर समुद्र से बाहर आए, असुरों की नजर उस पर पड़ गई। वे भी अमृत पीकर अमर होना चाहते थे। इसी लालच में उन्होंने भगवान धन्वंतरि के हाथों से अमृत कलश छीन लिया। इससे देवता परेशान हो गए और सहायता के लिए भगवान विष्णु के पास पहुंचे। देवताओं की मदद करने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया। अपने रूप और बातों से उन्होंने असुरों को मोहित कर लिया। इसके बाद उन्होंने अमृत बांटने की जिम्मेदारी अपने हाथ में ले ली। कथा के अनुसार, मोहिनी ने अमृत देवताओं को पिला दिया और इस तरह देवताओं को अमरता प्राप्त हुई। इस पूरे प्रसंग का वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध में मिलता है।
धनतेरस पर क्यों की जाती है भगवान धन्वंतरि की पूजा
धनतेरस को धनत्रयोदशी भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन भगवान धन्वंतरि समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसलिए इस दिन उनकी पूजा करने की परंपरा है। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद और स्वास्थ्य का देवता माना जाता है। उनकी पूजा करके लोग अपने और परिवार के लिए अच्छी सेहत, लंबी उम्र और निरोगी जीवन की कामना करते हैं। यही वजह है कि धनतेरस का महत्व केवल सोने-चांदी और बर्तन खरीदने तक सीमित नहीं है। इस दिन स्वास्थ्य और परिवार की खुशहाली को भी विशेष महत्व दिया जाता है। कई जगहों पर धनतेरस के अवसर पर आयुर्वेद से जुड़े कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। लोग भगवान धन्वंतरि से प्रार्थना करते हैं कि उनके परिवार में सुख-शांति बनी रहे और सभी सदस्य स्वस्थ रहें।

धनतेरस की कथा हमें क्या सीख देती है
भगवान धन्वंतरि और अमृत कलश से जुड़ी समुद्र मंथन की कथा हमें जीवन का एक जरूरी संदेश देती है। धन और सुख-सुविधाएं अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अच्छी सेहत के बिना इनका पूरा आनंद नहीं लिया जा सकता। अमृत कलश को जीवन और आरोग्य का प्रतीक माना जाता है। इसलिए धनतेरस पर सोने-चांदी और नई चीजों की खरीदारी करने के साथ-साथ अपने और परिवार के स्वास्थ्य का ध्यान रखने का संकल्प भी लेना चाहिए। यही इस पर्व से जुड़ा एक सुंदर संदेश है।