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छठ के प्रसाद में क्यों खास होता है ठेकुआ? जानिए कैसे बिहार की पहचान बन गया यह पारंपरिक पकवान

  • Edited By Priya Yadav,
  • Updated: 03 Nov, 2026 11:15 AM
छठ के प्रसाद में क्यों खास होता है ठेकुआ? जानिए कैसे बिहार की पहचान बन गया यह पारंपरिक पकवान

नारी डेस्क:   बिहार में छठ महापर्व की बात हो और ठेकुआ का जिक्र न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता। गुड़, देसी घी और सौंफ की खुशबू से तैयार होने वाला ठेकुआ छठ पूजा के सबसे खास प्रसादों में से एक है। त्योहार के दिनों में घरों में इसकी खुशबू दूर तक फैल जाती है। खास बात यह है कि ठेकुआ सिर्फ एक मिठाई या पकवान नहीं, बल्कि बिहार की संस्कृति, परंपरा और लोगों की भावनाओं से भी जुड़ा हुआ है। आज बिहार के अलावा झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी इसे बड़े चाव से बनाया जाता है। इतना ही नहीं, नौकरी और पढ़ाई के लिए दूसरे शहरों में रहने वाले बिहारी परिवार भी छठ के मौके पर ठेकुआ बनाना नहीं भूलते। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर छठ पूजा में ठेकुआ को ही इतना खास स्थान क्यों मिला? इसकी शुरुआत कैसे हुई और कैसे यह बिहार की पहचान बन गया? आइए जानते हैं इसकी पूरी कहानी।

सदियों पुरानी है ठेकुआ बनाने की परंपरा

ठेकुआ कब और किसने सबसे पहले बनाया, इसका कोई प्रमाणित ऐतिहासिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। हालांकि, बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में इसे लंबे समय से बनाने की परंपरा रही है। पहले गांवों में त्योहारों और खास अवसरों पर घर की महिलाएं गेहूं के आटे, गुड़ और घी से ठेकुआ तैयार करती थीं। धीरे-धीरे यह पकवान छठ पूजा का अहम हिस्सा बन गया। आज भी छठ के समय घरों में ठेकुआ बनाने की तैयारियां कई दिन पहले से शुरू हो जाती हैं। परिवार के सभी लोग मिलकर इसे तैयार करते हैं और इसकी खुशबू त्योहार के माहौल को और खास बना देती है।

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साधारण चीजों से तैयार होता था ठेकुआ

पुराने समय में गांवों में गेहूं का आटा, गुड़, देसी घी और सौंफ जैसी चीजें आसानी से मिल जाती थीं। इन्हीं साधारण सामग्रियों से ठेकुआ तैयार किया जाता था। इसे बनाने के लिए किसी महंगी सामग्री या खास उपकरण की जरूरत नहीं पड़ती थी। इसके अलावा ठेकुआ को अच्छी तरह तलने के कारण यह कई दिनों तक सुरक्षित रखा जा सकता है। पुराने समय में जब खाने की चीजों को लंबे समय तक सुरक्षित रखना आज जितना आसान नहीं था, तब यह इसकी लोकप्रियता की एक बड़ी वजह रही होगी। यही कारण है कि यह पकवान त्योहारों और खास मौकों पर लोगों की पसंद बन गया।

कैसे पड़ा ठेकुआ नाम?

ठेकुआ के नाम को लेकर भी एक दिलचस्प मान्यता प्रचलित है। इसे बनाने के लिए सबसे पहले आटे की छोटी-छोटी लोइयां तैयार की जाती हैं। इसके बाद इन्हें लकड़ी के नक्काशीदार सांचे पर रखकर हथेली से दबाया जाता है, जिससे ठेकुआ पर सुंदर डिजाइन बन जाते हैं। माना जाता है कि आटे को सांचे पर ठोककर या दबाकर आकार देने की इसी प्रक्रिया से इसका नाम ठेकुआ पड़ा। हालांकि, इसके नाम की उत्पत्ति को लेकर कोई प्रमाणित जानकारी उपलब्ध नहीं है।

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कैसे तैयार किया जाता है पारंपरिक ठेकुआ?

ठेकुआ बनाने की विधि जितनी आसान है, इसका स्वाद उतना ही खास होता है। इसे बनाने के लिए गेहूं का आटा, गुड़, देसी घी और सौंफ का इस्तेमाल किया जाता है। सबसे पहले गुड़ को पानी में घोलकर उसका मिश्रण तैयार किया जाता है। फिर गेहूं के आटे में देसी घी और सौंफ मिलाकर गुड़ के पानी से आटा गूंथा जाता है। इसके बाद आटे की छोटी-छोटी लोइयां बनाकर लकड़ी के सांचे से उन्हें मनचाहा आकार दिया जाता है। फिर इन्हें धीमी आंच पर तेल या घी में सुनहरा और कुरकुरा होने तक तला जाता है। कुछ घरों में स्वाद बढ़ाने के लिए इसमें इलायची और नारियल भी मिलाया जाता है। हालांकि, पारंपरिक ठेकुआ का स्वाद गुड़, घी और सौंफ के मेल से ही आता है।

छठ पूजा में क्यों खास है ठेकुआ का महत्व?

छठ पूजा में ठेकुआ को महाप्रसाद का विशेष स्थान प्राप्त है। यह पर्व भगवान सूर्य और छठी मैया को समर्पित होता है। इस दौरान प्रसाद बनाने से लेकर पूजा की हर तैयारी में साफ-सफाई और शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है। ठेकुआ बनाने के लिए कई परिवार गेहूं को पहले अच्छी तरह धोकर सुखाते हैं। इसके बाद उसे चक्की में पिसवाकर आटा तैयार किया जाता है। घर की महिलाएं पूरे नियम और श्रद्धा के साथ ठेकुआ बनाती हैं। छठ पूजा के तीसरे दिन डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और चौथे दिन सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया जाता है। इस दौरान बांस के सूप और टोकरी में ठेकुआ के साथ केला, नारियल, गन्ना और दूसरे मौसमी फल सजाए जाते हैं। इन्हें सूर्य देव और छठी मैया को अर्पित किया जाता है। इसके बाद प्रसाद परिवार और दूसरे लोगों में बांटा जाता है। यही वजह है कि छठ पूजा में ठेकुआ सिर्फ खाने की चीज नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा का प्रतीक माना जाता है।

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बिहार से निकलकर देशभर में पहुंचा ठेकुआ

एक समय था जब ठेकुआ मुख्य रूप से बिहार और आसपास के राज्यों में ही बनाया जाता था, लेकिन अब इसकी पहचान देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंच चुकी है। बिहार से बाहर नौकरी, पढ़ाई और दूसरे कामों के लिए रहने वाले लोग भी छठ का त्योहार उसी श्रद्धा और उत्साह से मनाते हैं। दिल्ली, मुंबई, पंजाब, हरियाणा और देश के कई दूसरे शहरों में रहने वाले बिहारी परिवार छठ पूजा के मौके पर घर में ठेकुआ जरूर बनाते हैं। कई जगहों पर स्थानीय लोग भी इस पारंपरिक पकवान का स्वाद लेने लगे हैं।

आज ठेकुआ बिहार की संस्कृति और पहचान का एक अहम हिस्सा बन चुका है। इसके स्वाद में जहां गुड़ और घी की मिठास है, वहीं इससे जुड़ी परंपरा में परिवार, अपनापन और छठ महापर्व की आस्था भी शामिल है। यही कारण है कि समय बदलने के बावजूद ठेकुआ की लोकप्रियता कम नहीं हुई है।
 

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