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Sugar Price in India: अचानक क्यों महंगी हुई चीनी? जाने कीमत बढ़ने की वजह

  • Edited By Priya Yadav,
  • Updated: 25 Aug, 2026 01:37 PM
Sugar Price in India: अचानक क्यों महंगी हुई चीनी? जाने कीमत बढ़ने की वजह

 नारी डेस्क:  अगर आपको हाल के दिनों में किराना दुकान पर चीनी खरीदते समय पहले से ज्यादा पैसे देने पड़ रहे हैं, तो इसकी वजह सिर्फ त्योहारों की बढ़ती मांग नहीं है। अगस्त 2026 में देश में चीनी की कीमतों में तेज उछाल आया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 20 जुलाई को चीनी का औसत खुदरा भाव ₹48.18 प्रति किलो था, जो 20 अगस्त तक बढ़कर ₹55.70 प्रति किलो हो गया। यानी करीब एक महीने में कीमत में लगभग 16 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।  चीनी की बढ़ती कीमतों को देखते हुए सरकार ने भी कदम उठाए हैं। केंद्र ने 31 अक्टूबर 2026 तक 10 लाख टन कच्ची चीनी (Raw Sugar) के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है, ताकि घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़े और कीमतों पर दबाव कम हो। 

आज 1 किलो चीनी कितने रुपये की मिल रही है

फिलहाल देशभर में चीनी का भाव एक जैसा नहीं है। सरकारी औसत खुदरा कीमत करीब ₹55-56 प्रति किलो के स्तर पर पहुंच चुकी है, जबकि अलग-अलग शहरों और दुकानों में कीमत इससे ऊपर-नीचे हो सकती है। ब्रांड, क्वालिटी, पैकिंग और स्थानीय सप्लाई के हिसाब से ग्राहक को अलग कीमत चुकानी पड़ सकती है।  यानी अगर आपके इलाके में 1 किलो चीनी ₹55 से ज्यादा में मिल रही है, तो यह मौजूदा बाजार की तेजी के बीच असामान्य नहीं है। हालांकि, स्थानीय दुकान का रेट सरकारी राष्ट्रीय औसत से अलग हो सकता है।

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आखिर अचानक क्यों बढ़ गए चीनी के दाम

चीनी की मौजूदा तेजी के पीछे कई वजहें एक साथ काम कर रही हैं। केंद्र सरकार के मुताबिक इसे किसी एक कारण से जोड़ना सही नहीं होगा। कम उत्पादन, त्योहारों से पहले बढ़ती मांग, मौसम से गन्ने की फसल को हुआ नुकसान और बाजार में जमाखोरी या सट्टेबाजी जैसी गतिविधियां कीमतों पर असर डाल रही हैं। 

उत्पादन अनुमान से कम रहना

मौजूदा सीजन में देश में चीनी का उत्पादन शुरुआती अनुमान से कम रहने की बात सामने आई है। सरकार के अनुसार उत्पादन करीब 306 लाख टन रहने का अनुमान है, जबकि गन्ना उत्पादक राज्यों की शुरुआती गणना करीब 343 लाख टन की थी। गन्ने की फसल को रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियों के साथ-साथ ज्यादा बारिश से हुए जलभराव का भी नुकसान हुआ। इससे चीनी उत्पादन पर दबाव बढ़ा और बाजार में उपलब्धता को लेकर चिंता पैदा हुई। 

त्योहारों से पहले बढ़ी मांग

अगस्त से नवंबर के बीच देश में चीनी की मांग आम तौर पर बढ़ जाती है। गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों के दौरान घरों के अलावा मिठाई की दुकानों, हलवाई और खाद्य कंपनियों की तरफ से भी चीनी की खपत बढ़ती है। इस बार मांग बढ़ने के साथ बाजार में उपलब्ध स्टॉक को लेकर चिंता भी बनी हुई है। इसी वजह से कीमतों पर तेजी का दबाव देखने को मिला। 

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जमाखोरी और सट्टेबाजी भी बनी वजह

सरकार ने चीनी की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी के पीछे कुछ कारोबारियों की ओर से जमाखोरी और सट्टेबाजी को भी एक कारण बताया है। इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) ने भी 24 अगस्त को कहा कि देश में चीनी की वास्तविक कमी नहीं है और मौजूदा तेजी में स्टॉक जमा करने तथा सट्टेबाजी की भूमिका हो सकती है।  इसका मतलब यह है कि बाजार में कीमत बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि देश में चीनी खत्म हो रही है। उपलब्ध स्टॉक घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त बताया जा रहा है।

क्या एथेनॉल की वजह से महंगी हुई चीनी

चीनी की कीमत बढ़ने के बीच एथेनॉल के लिए गन्ने और चीनी के डायवर्जन की भी चर्चा हो रही है। हालांकि, केंद्र सरकार ने साफ किया है कि मौजूदा तेजी को सिर्फ एथेनॉल उत्पादन से जोड़ना सही नहीं है। सरकार के मुताबिक, एथेनॉल के लिए डायवर्ट की गई चीनी की हिस्सेदारी 2022-23 में करीब 12 फीसदी से घटकर 2025-26 में लगभग 9 फीसदी रह गई है। साथ ही, देश में बनने वाले एथेनॉल का करीब तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, खासकर मक्का, से आता है। 

दुनिया के बाजार में भी चीनी हुई महंगी

भारत ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी चीनी की कीमतों पर दबाव है। सरकार के अनुसार, 2026-27 के लिए वैश्विक चीनी घाटा करीब 33 लाख टन रहने का अनुमान है। मौसम को लेकर चिंताओं ने भी वैश्विक सप्लाई के अनुमान को प्रभावित किया है। 30 जून 2026 से 20 अगस्त 2026 के बीच अंतरराष्ट्रीय चीनी कीमत करीब 474 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 552 डॉलर प्रति टन हो गई। यानी दो महीने से भी कम समय में इसमें 16 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई। 

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भारत ने करीब 10 साल बाद क्यों मंगाई चीनी

बढ़ती कीमतों और त्योहारों से पहले पर्याप्त सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। यह फैसला करीब एक दशक के अंतराल के बाद घरेलू बाजार के लिए चीनी आयात की दिशा में बड़ा कदम है।  DGFT के नियमों के तहत यह आयात 31 अक्टूबर 2026 तक टैरिफ रेट कोटा (TRQ) के तहत बिना शुल्क किया जा सकेगा। खास बात यह है कि आयात कच्ची चीनी का होगा, जिसे रिफाइन करने के बाद ही सफेद चीनी के तौर पर घरेलू बाजार में बेचा जा सकेगा।  सरकार का मकसद बाजार में अतिरिक्त सप्लाई लाना, कीमतों पर दबाव कम करना और त्योहारों के दौरान किसी तरह की कमी की आशंका को दूर करना है।

क्या भारत में चीनी की किल्लत है

फिलहाल इसे देश में चीनी का संकट कहना सही नहीं होगा। सरकार और चीनी उद्योग दोनों का कहना है कि घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। सरकार के मुताबिक, मौजूदा स्टॉक अक्टूबर में नए पेराई सीजन के शुरू होने तक घरेलू मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त है।  ISMA ने भी कहा है कि बाजार में घबराने जैसी स्थिति नहीं है और आने वाले समय में कीमतों में नरमी आने की उम्मीद है। 

भारत किन देशों को चीनी निर्यात करता है

भारत लंबे समय से दुनिया के प्रमुख चीनी उत्पादक देशों में शामिल रहा है और घरेलू जरूरतों के अलावा अलग-अलग समय पर चीनी का निर्यात भी करता रहा है। बांग्लादेश, इंडोनेशिया, मलेशिया, श्रीलंका और नेपाल जैसे एशियाई बाजार भारतीय चीनी के खरीदार रहे हैं। इसके अलावा पश्चिम एशिया और अफ्रीका के कुछ देशों को भी भारतीय चीनी भेजी जाती रही है। हालांकि, घरेलू बाजार में कीमतों और उपलब्धता को देखते हुए सरकार की निर्यात नीति समय-समय पर बदली जाती रही है। मौजूदा स्थिति में प्राथमिकता घरेलू बाजार में पर्याप्त उपलब्धता और कीमतों को नियंत्रण में रखना है।

क्या आने वाले महीनों में चीनी और महंगी होगी

आने वाले महीनों में चीनी की कीमतों पर सबसे बड़ा असर त्योहारों की मांग, घरेलू स्टॉक और नई गन्ने की फसल पर पड़ेगा। सरकार की ओर से शुल्क-मुक्त आयात, स्टॉक लिमिट और नए पेराई सीजन को लेकर उठाए गए कदमों से कीमतों में बहुत तेज उछाल को रोकने की कोशिश की जा रही है।  अगर आयातित चीनी समय पर बाजार में पहुंचती है और अक्टूबर से शुरू होने वाले नए पेराई सीजन में गन्ने की उपलब्धता बेहतर रहती है, तो कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। फिलहाल बाजार में सबसे बड़ी चिंता सप्लाई की वास्तविक कमी से ज्यादा कीमतों में अचानक आई तेजी और उसके पीछे की सट्टेबाजी को लेकर है।

नोट: चीनी के खुदरा भाव शहर, दुकान, ब्रांड और खरीद की मात्रा के हिसाब से अलग हो सकते हैं। ऊपर दिए गए आंकड़े उपलब्ध सरकारी और बाजार रिपोर्टों पर आधारित हैं।
 

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