
नारी डेस्क: जहां एक तरफ सरकार देश को नशा मुक्त करने पर जोर दे रही है ताे वहीं दूसरी तरफ देश का भविष्य गहरे संकट में हैं। अब नशा स्कूल में भी पैर पसार चुका है, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की रिपोर्ट में चौंकाने वाली बात सामने आई है। आईसीएमआर के छह शहरों के स्कूलों पर हुए महत्त्वपूर्ण अध्ययन में पता चला है कि स्कूल जाने वाले बच्चे तेजी से नशे के आदि हो रहे हैं।
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गुवाहाटी के किशोरों का भविष्य संकट में
स्टडी के अनुसार गुवाहाटी के चुने हुए स्कूलों में 42.3 प्रतिशत किशोर नशीले पदार्थों के इस्तेमाल के मामले में मध्यम और उच्च जोखिम वाली श्रेणी में आते थे। इसकी तुलना में, नागपुर में यह आंकड़ा 7.1 प्रतिशत और पुडुचेरी में 0.1 प्रतिशत था। शोधकर्ताओं ने नशीले पदार्थों के इस्तेमाल का जोखिम बढ़ाने वाले कई कारकों की पहचान की, जिनमें नशीले पदार्थों का आसानी से मिलना, डिजिटल मीडिया का अधिक इस्तेमाल और नशीले पदार्थों के इस्तेमाल के प्रति सकारात्मक सोच शामिल हैं। कई कारकों को ध्यान में रखकर किए गए विश्लेषण से यह भी पता चला कि लड़कियों की तुलना में लड़कों में नशीले पदार्थों के इस्तेमाल का उच्च जोखिम होने की संभावना कम थी।
मोबाइल-इंटरनेट बिगाड़ रहे ज्यादा हालात
अध्ययन में यह भी सामने आया कि जिन किशोरों को नशीले पदार्थ आसानी से मिल सकते हैं और जो मोबाइल-इंटरनेट की दुनिया में ज्यादा समय बिताते हैं, उनमें नशे से जुड़े खतरे की संभावना ज्यादा रहती है। शोधकर्ताओं ने अक्तूबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच आंकड़े जुटाए। अध्ययन में छह जगहों के सरकारी और निजी स्कूलों में पढ़ने वाले 10 से 19 साल के किशोरों को शामिल किया गया। कुल 108 स्कूलों से 6,168 किशोर अध्ययन में शामिल हुए। शोध के मुताबिक ज्यादा डिजिटल संपर्क वाले किशोरों में ज्यादा खतरे वाली श्रेणी में आने की संभावना बढ़ी हुई थी।
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नशे के कारण पढ़ाई छोड़ रहे किशोर
स्टडी में बताया गया है कि किशोरों द्वारा तंबाकू, शराब, गांजा, इनहेलेंट्स और फार्मास्युटिकल दवाओं का इस्तेमाल लंबे समय तक स्वास्थ्य और सामाजिक परिणामों से जुड़ा है, जिनमें लत, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकार, पढ़ाई में खराब प्रदर्शन और स्कूल छोड़ना शामिल है। लेखकों ने पाया कि भले ही आयुष्मान भारत के तहत 'स्कूल हेल्थ प्रोग्राम' जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रमों से जागरूकता बढ़ी है, लेकिन नतीजों से पता चलता है कि सिर्फ़ बड़े राष्ट्रीय अभियानों से इलाके के हिसाब से मौजूद चुनौतियों का ठीक से समाधान नहीं हो सकता। पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह स्टडी भारत में किशोरों द्वारा नशीले पदार्थों के इस्तेमाल पर हुई सीमित मल्टी-साइट रिसर्च में अहम सबूत जोड़ती है। इससे खास तौर पर उन इलाकों में टारगेटेड उपाय करने में मदद मिल सकती है, जहां ज़्यादा जोखिम की पहचान की गई है।