
नारी डेस्क: 19 मार्च 2026 से शुरू हो रहा हिंदू नववर्ष विक्रम संवत 2083 इस बार ‘रौद्र संवत्सर’ के नाम से जाना जाएगा। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ऐसा समय लगभग 60 साल पहले, साल 1966 में भी आया था, जिसे लेकर कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं। ‘रौद्र’ शब्द का अर्थ होता है उग्र या तीव्र स्वभाव वाला। मान्यता है कि ऐसे संवत्सर में परिस्थितियां थोड़ी चुनौतीपूर्ण हो सकती हैं और कई क्षेत्रों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
यह है ग्रहों की स्थिति
यह संवत्सर 19 मार्च 2026 से शुरू होकर 7 अप्रैल 2027 तक रहेगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस वर्ष राजा बृहस्पति (गुरु) हैं। मंत्री मंगल है। बृहस्पति को ज्ञान, धर्म और न्याय का ग्रह माना जाता है, जबकि मंगल ऊर्जा, युद्ध और आक्रामकता का प्रतीक है। इन दोनों के संयोजन को मिश्रित फल देने वाला माना जा रहा है। ज्योतिष में रौद्र संवत्सर को उग्र और संघर्षपूर्ण माना जाता है। इस समय लग्न में मंगल के साथ राहु की युति बन रही है, जिसे ज्योतिष में अशुभ माना जाता है।
संवत्सर को लेकर भविष्यवाणी
ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार इस संवत्सर में सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर संघर्ष या तनाव बढ़ सकता है। प्राकृतिक आपदाओं (जैसे बाढ़, भूकंप, असामान्य मौसम) की संभावना रह सकती है। महंगाई और आर्थिक उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। मौसम में अस्थिरता के कारण खेती-किसानी प्रभावित हो सकती है। इसी बीच भारत पर आतंकवादी हमले की फिर से संभावना बन रही है जिसके चलते एक बार फिर भारत और पाकिस्तान के बीच छोटे स्तर का युद्ध हो सकता है। कई देशों की भूमि पर कब्जा होगा। 2026 में भारत में बड़े नीतिगत बदलाव होंगे। हालांकि बृहस्पति के प्रभाव से धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में वृद्धि हो सकती है। लोगों में ज्ञान और जागरूकता बढ़ सकती है। कई क्षेत्रों में सुधार और नए अवसर भी बन सकते हैं
नोट: ज्योतिष केवल संकेत देता है, भविष्य तय नहीं करता। इसलिए घबराने की बजाय इस समय को सजग और संतुलित रहकर बेहतर बनाने की कोशिश करें।