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फिलर्स कराने की सोच रहे हैं? पहले जान लें भारत में New guidelines

  • Edited By Priya Yadav,
  • Updated: 25 Aug, 2026 09:51 AM
फिलर्स कराने की सोच रहे हैं? पहले जान लें भारत में New guidelines

 नारी डेस्क:  बोटॉक्स और डर्मल फिलर्स आज के दौर में सबसे ज्यादा चर्चित कॉस्मेटिक इंजेक्टेबल ट्रीटमेंट्स में शामिल हैं। लेकिन इनके अलावा भी एस्थेटिक इंडस्ट्री में कई तरह के ऐसे प्रोडक्ट इस्तेमाल किए जा रहे हैं, जिन्हें इंजेक्शन के जरिए त्वचा में पहुंचाया जाता है। इनमें मेसोथेरेपी, PRP यानी प्लेटलेट-रिच प्लाज्मा, जिसे आमतौर पर ‘वैम्पायर फेशियल’ के नाम से भी जाना जाता है, और हायलूरोनिक एसिड स्किन बूस्टर जैसे ट्रीटमेंट शामिल हैं। हाल ही में Central Drugs Standard Control Organisation (CDSCO) की ओर से जारी निर्देश ने इन प्रोडक्ट्स के इस्तेमाल और उनकी मार्केटिंग को लेकर तस्वीर काफी हद तक साफ कर दी है। नए निर्देश के मुताबिक, कॉस्मेटिक्स को इंजेक्शन के जरिए इस्तेमाल करने के लिए नहीं बनाया जा सकता। कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल केवल त्वचा पर लगाने, डालने, छिड़कने या स्प्रे करने के लिए होना चाहिए।

फिलर्स और बोटॉक्स कौन कर सकता है?

इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में बोटॉक्स या डर्मल फिलर्स जैसे इंजेक्टेबल एस्थेटिक ट्रीटमेंट बंद हो गए हैं। ऐसे उपचार योग्य और प्रशिक्षित मेडिकल डॉक्टर ही कर सकते हैं, जिनके पास इसके लिए जरूरी प्रशिक्षण और योग्यता हो। गुरुग्राम की सर्जन और कॉस्मेटोलॉजिस्ट डॉ. गीता ग्रेवाल का मानना है कि इस तरह के नियम की जरूरत काफी समय से महसूस की जा रही थी। उनके मुताबिक, इंजेक्टेबल ट्रीटमेंट से जुड़ी जटिलताओं के कई मामले सामने आते रहे हैं और कंज्यूमर कोर्ट में भी ऐसी शिकायतें पहुंची हैं। बढ़ती मांग के बीच अब मरीज भी यह समझने लगे हैं कि हर एस्थेटिशियन के पास इस तरह की प्रक्रिया करने का जरूरी कौशल नहीं होता।

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सिर्फ डॉक्टर होना भी काफी नहीं

कॉस्मेटिक डर्मेटोलॉजिस्ट और बेंगलुरु स्थित Kosmoderma Clinics और SkinQ की संस्थापक डॉ. च्यत्रा वी. आनंद के मुताबिक, एस्थेटिक इंजेक्टेबल प्रक्रियाएं कभी भी गैर-मेडिकल प्रोफेशनल्स के लिए नहीं थीं। मरीज की सुरक्षा के लिहाज से यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है। भारत में इंजेक्टेबल एस्थेटिक प्रक्रिया करने की न्यूनतम कानूनी जरूरत यह है कि व्यक्ति Registered Medical Practitioner यानी RMP हो। हालांकि, सिर्फ RMP होना अपने आप में पर्याप्त नहीं माना जाना चाहिए। एस्थेटिक मेडिसिन तेजी से बदलने वाला क्षेत्र है और मेडिकल ग्रेजुएशन के दौरान इन प्रक्रियाओं की व्यापक ट्रेनिंग आमतौर पर नहीं मिलती। इसलिए डॉक्टरों को इंजेक्टेबल्स, चेहरे की एनाटॉमी और संभावित जटिलताओं को संभालने के लिए अतिरिक्त और व्यवस्थित प्रशिक्षण लेना जरूरी है।

गैर-मेडिकल लोगों के इंजेक्शन लगाने पर चिंता

डॉ. गीता ग्रेवाल ने एस्थेटिक इंडस्ट्री में ऐसे मामलों पर चिंता जताई है, जहां गैर-मेडिकल बैकग्राउंड वाले लोग भी इंजेक्टेबल प्रक्रियाएं करने की कोशिश कर रहे हैं। उनके मुताबिक, कुछ क्लीनिकों में यूनानी या आयुर्वेदिक प्रोफेशनल्स और फिजियोथेरेपिस्ट तक को इंजेक्शन लगाने के लिए नियुक्त किए जाने की जानकारी सामने आती रही है। उन्होंने बताया कि उन्हें एस्थेटिक इंडस्ट्री से जुड़े ऐसे लोगों के आवेदन भी मिलते हैं, जिनकी मेडिकल ट्रेनिंग इस तरह की प्रक्रियाओं के लिए पर्याप्त नहीं है। सोशल मीडिया पर एस्थेटिक ट्रीटमेंट्स का बढ़ता चलन और आकर्षक ‘पहले और बाद’ की तस्वीरें इस क्षेत्र में लोगों की दिलचस्पी बढ़ा रही हैं, लेकिन सिर्फ किसी कोर्स या फेलोशिप के आधार पर इंजेक्शन जैसी मेडिकल प्रक्रिया करना मरीजों के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।

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गलत इंजेक्शन से हो सकती हैं गंभीर जटिलताएं

इंजेक्टेबल एस्थेटिक ट्रीटमेंट देखने में भले ही आसान लगें, लेकिन इनके दौरान चेहरे की नसों और रक्त वाहिकाओं की गहरी समझ बेहद जरूरी होती है। डॉ. ग्रेवाल के मुताबिक, उन्होंने ऐसे गंभीर मामले देखे हैं जहां गैर-लाइसेंस प्राप्त क्लीनिकों में उपचार के बाद मरीजों को स्किन बर्न, आर्टेरियल ब्लॉकेज और त्वचा के टिश्यू के नष्ट होने यानी नेक्रोसिस जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा। ऐसी जटिलताओं में तुरंत और सही मेडिकल मैनेजमेंट जरूरी होता है। यही वजह है कि इंजेक्टेबल प्रक्रियाओं को केवल प्रशिक्षित मेडिकल प्रोफेशनल्स तक सीमित रखने पर जोर दिया जा रहा है।

कॉस्मेटिक और इंजेक्टेबल प्रोडक्ट्स के बीच अंतर साफ

डॉ. आनंद के मुताबिक, भारत में अलग-अलग प्रोडक्ट्स की लेबलिंग और उनकी कैटेगरी को लेकर भी लंबे समय से स्पष्टता की जरूरत थी। जो प्रोडक्ट इंजेक्शन के जरिए शरीर में पहुंचाया जाना है, उसका मूल्यांकन और रजिस्ट्रेशन उसी नियामकीय प्रक्रिया के तहत होना चाहिए जो इंजेक्टेबल प्रोडक्ट्स पर लागू होती है। ऐसे प्रोडक्ट्स के लिए क्वालिटी, स्टेरिलिटी, मैन्युफैक्चरिंग स्टैंडर्ड, सुरक्षा और क्लिनिकल परफॉर्मेंस से जुड़े ज्यादा सख्त मूल्यांकन की जरूरत होती है। इन्हें केवल इसलिए कॉस्मेटिक नहीं माना जा सकता क्योंकि इनका इस्तेमाल सौंदर्य संबंधी उद्देश्य के लिए किया जा रहा है।

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कंपनियों की मार्केटिंग पर भी पड़ेगा असर

नए निर्देश का असर सिर्फ क्लीनिक और डॉक्टरों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन कंपनियों पर भी पड़ सकता है जो इन प्रोडक्ट्स को बाजार में बेचती या प्रमोट करती हैं। डॉ. ग्रेवाल के मुताबिक, पहले कुछ मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव्स मेसोथेरेपी और PDRN जैसे प्रोडक्ट्स को इंजेक्टेबल के तौर पर प्रमोट करते थे। अब ऐसे मामलों में कंपनियां यह स्पष्ट करने लगी हैं कि संबंधित प्रोडक्ट नॉन-इंजेक्टेबल है। इससे उन प्रोडक्ट्स की मार्केटिंग पर भी लगाम लगने की उम्मीद है जिन्हें कॉस्मेटिक बताकर इंजेक्शन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था।

डॉ. आनंद भी मानती हैं कि इंजेक्शन के जरिए इस्तेमाल होने वाले कुछ प्रोडक्ट्स को कॉस्मेटिक्स के रूप में रजिस्टर किए जाने से नियामकीय स्थिति को लेकर भ्रम पैदा हुआ। CDSCO का निर्देश इस अंतर को स्पष्ट करने में मदद करता है कि किसी प्रोडक्ट को केवल एस्थेटिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किए जाने के आधार पर कॉस्मेटिक नहीं माना जा सकता, अगर उसे शरीर में इंजेक्शन के जरिए दिया जा रहा है।

एस्थेटिक कोर्स करने वालों के लिए भी बड़ा सबक

एस्थेटिक इंडस्ट्री में करियर बनाने की तैयारी कर रहे लोगों के लिए भी इस बदलाव को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। डॉ. ग्रेवाल का कहना है कि इंस्टाग्राम पर दिखने वाली ‘बिफोर-आफ्टर’ तस्वीरों को देखकर इन प्रक्रियाओं को आसान समझना ठीक नहीं है। फिलर्स और दूसरे इंजेक्शन आधारित ट्रीटमेंट्स में चेहरे की एनाटॉमी की गहरी समझ जरूरी होती है। सर्जरी में डॉक्टर शरीर के अंदर के टिश्यू को सीधे देख सकता है, लेकिन इंजेक्शन के दौरान ऐसा नहीं होता। डॉक्टर को टिश्यू की गहराई और सुई के रास्ते का अनुभव होना चाहिए ताकि वह समझ सके कि इंजेक्शन सुरक्षित जगह पर जा रहा है या नहीं।

ब्यूटीशियन और नॉन-मेडिकल एस्थेटिशियन की भूमिका खत्म नहीं

इसका मतलब यह भी नहीं है कि एस्थेटिक इंडस्ट्री में काम करने वाले ब्यूटीशियन या नॉन-मेडिकल एस्थेटिशियन की भूमिका खत्म हो जाएगी। डॉ. आनंद के मुताबिक, वे मेडिकल प्रोफेशनल्स की सहायता करने, मरीजों को जरूरी जानकारी देने और अपनी ट्रेनिंग व अधिकार क्षेत्र के भीतर आने वाली नॉन-इनवेसिव प्रक्रियाएं करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, इंजेक्टेबल प्रक्रियाओं को प्रशिक्षित और योग्य Registered Medical Practitioners के दायरे में ही रखा जाना चाहिए। चाहे वह एस्थेटिक डॉक्टर हो, डर्मेटोलॉजिस्ट या प्लास्टिक सर्जन मरीज की सुरक्षा के लिए उचित ट्रेनिंग, जवाबदेही और जटिलताओं को संभालने की क्षमता सबसे जरूरी है।

फिलर्स कराने से पहले क्या ध्यान रखें

अगर आप बोटॉक्स, फिलर्स या किसी अन्य इंजेक्टेबल एस्थेटिक ट्रीटमेंट के बारे में सोच रहे हैं, तो सिर्फ क्लिनिक की सोशल मीडिया तस्वीरों या ऑफर देखकर फैसला न करें। सबसे पहले यह पता करें कि प्रक्रिया कौन कर रहा है, उसकी मेडिकल योग्यता और इंजेक्टेबल एस्थेटिक्स में ट्रेनिंग क्या है और किसी संभावित जटिलता की स्थिति में क्लिनिक में उचित मेडिकल सहायता उपलब्ध है या नहीं।

आखिरकार, चेहरे पर होने वाली ऐसी प्रक्रियाएं सिर्फ खूबसूरती से जुड़ा फैसला नहीं हैं। इनमें मेडिकल रिस्क भी शामिल होता है, इसलिए सही डॉक्टर, सही प्रोडक्ट और सही मेडिकल सेटअप चुनना सबसे अहम है।
 

 
 
 

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