
नारी डेस्क: गाजियाबाद के हरीश राणा की कहानी दिल तोड़ देने वाली है। हरीश एक फिट और हैंडसम बॉडीबिल्डर और इंजीनियरिंग छात्र थे, जिन्होंने अपने माता-पिता के सपने को पूरा करने के लिए मेहनत की। लेकिन 20 अगस्त 2013 को उनकी जिंदगी बदल गई। हरीश चंडीगढ़ की एक निजी यूनिवर्सिटी के हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए, जिससे उनके सिर में गंभीर चोटें आईं और वे कोमा में चले गए।
13 साल का संघर्ष और इलाज
हरीश के लिए उसके माता-पिता, खासकर पिता अशोक राणा, ने जिंदगी भर की कमाई और बचत इस इलाज में लगा दी। हरीश का इलाज चंडीगढ़ पीजीआई, दिल्ली एम्स और देश के कई बड़े प्राइवेट अस्पतालों में हुआ। आर्थिक बोझ इतना बढ़ गया कि अशोक राणा ने दिल्ली में अपना घर बेच दिया और पांच-सितारा होटल में नौकरी छोड़कर छोटे-मोटे काम करने लगे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, हरीश के 13 साल के इलाज पर कुल 50 लाख रुपए से अधिक खर्च हो चुके हैं।
लाइफ सपोर्ट पर खर्च
डॉ. हिमांशु गुप्ता, आपातकाल हेल्थ एक्सपर्ट, बताते हैं कि आईसीयू, वेंटिलेटर और लाइफ सपोर्ट पर मरीज को रखना बहुत महंगा होता है। एक दिन का खर्च औसतन 10 हजार रुपये तक आता है, जो अस्पताल और मरीज की स्थिति पर निर्भर करता है। उन्होंने यह भी बताया कि भरोसेमंद हेल्थ इंश्योरेंस होना बेहद जरूरी है। क्योंकि जीवन में कभी भी अप्रत्याशित मोड़ आ सकता है, और इंश्योरेंस आर्थिक मदद देकर सबसे मुश्किल समय में सहारा देता है।
इच्छा मृत्यु की मंजूरी
हरीश 13 सालों से लाइफ सपोर्ट पर रहने के बाद अब इच्छामृत्यु प्रक्रिया के लिए एम्स दिल्ली में ले जाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद डॉक्टरों ने पासिव यूथेनेशिया प्रक्रिया शुरू की है। इसका मतलब है कि हरीश को सम्मानजनक तरीके से जीवनरक्षक उपकरणों से धीरे-धीरे अलग किया जाएगा।
सोशल मीडिया पर हरीश की अंतिम यात्रा और विदाई का वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें उनके माता-पिता और परिवार के लोग भावुक दिखाई दे रहे हैं। हरीश राणा की कहानी न सिर्फ एक युवक की दुखद परिस्थितियों की है, बल्कि यह उन माता-पिता की अटूट मेहनत, संघर्ष और दर्द भी दर्शाती है जिन्होंने अपने बेटे के लिए सब कुछ कुर्बान कर दिया। इस केस ने यह भी स्पष्ट किया कि जीवन में हेल्थ इंश्योरेंस और मेडिकल तैयारी कितनी जरूरी है।