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Menstrual Health को लेकर लड़कियों को छोड़ना पड़ रहा है स्कूल, इस मुद्दे पर नाराज हुआ Supreme Court

  • Edited By vasudha,
  • Updated: 19 Oct, 2026 02:11 PM
Menstrual Health को लेकर लड़कियों को छोड़ना पड़ रहा है स्कूल, इस मुद्दे पर नाराज हुआ Supreme Court

नारी डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) द्वारा केंद्र को जवाब न दिए जाने पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने पूछा था कि मासिक धर्म स्वच्छता को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत 'मौलिक अधिकार' का हिस्सा मानने वाले उसके फैसले को कैसे लागू किया जा रहा है। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा- "अगर हमारे फैसले की बातें सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाएंगी, तो केंद्र और राज्य/केंद्र शासित प्रदेश इस मौलिक अधिकार को कैसे लागू करेंगे?"

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मासिक धर्म स्वास्थ्य के अधिकार को लेकर कोर्ट सख्त

कोर्ट ने कहा कि उसने मासिक धर्म स्वच्छता/स्वास्थ्य को संविधान के अनुच्छेद 21 का एक हिस्सा माना है, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा से जुड़ा है। पीठ ने बताया कि 1 सितंबर को उसने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि वे कोर्ट द्वारा बताई गई कमियों पर ध्यान दें और अगली सुनवाई तक इस संबंध में रिपोर्ट दें। 30 जनवरी को दिए गए एक अहम फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत 'जीवन के अधिकार' में 'मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार' भी शामिल है। 13 अक्टूबर को इस मामले की सुनवाई के दौरान, केंद्र की ओर से पेश हुईं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने पीठ को बताया कि भारत सरकार ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ इस मुद्दे को बहुत गंभीरता से उठाया है और उनसे पूछा है कि फैसले को किस तरह लागू किया जा रहा है।

menstrual hygiene का क्या है मकसद? 

पीठ ने कहा-  "दुर्भाग्य से, राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों ने अभी तक केंद्र को कोई जवाब नहीं दिया है। हमें समझ नहीं आता कि जब केंद्र सरकार जरूरी जानकारी मांगती है, तो राज्य और केंद्र शासित प्रदेश जवाब क्यों नहीं देते?" पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला उन युवा लड़कियों के हित में है, जो मासिक धर्म स्वच्छता (menstrual hygiene) जैसी समस्याओं के कारण अपनी पढ़ाई छोड़ रही थीं, खासकर देश के दूर-दराज के इलाकों में। पीठ ने कहा-  "हम केंद्र सरकार को निर्देश देते हैं कि वह हर राज्य/केंद्र शासित प्रदेश के साथ इस मुद्दे पर गंभीरता से बात करे और लिखित रूप में यह जानकारी मांगे कि इस अदालत के फैसले को लागू करने के लिए उन्होंने अब तक क्या कदम उठाए हैं।"


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ये था कोर्ट का आदेश

1 सितंबर के अपने आदेश में, पीठ ने कहा था कि ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि कितने स्कूलों में लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग, चालू हालत वाले शौचालय है  जिनमें पानी की सुविधा हो और जो गोपनीयता (privacy) व पहुंच सुनिश्चित करते हों। तब केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि देश भर के स्कूलों में लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग 30,458 शौचालय बनाए गए हैं, जिनमें धोने की सुविधा भी है, जबकि 4,236 शौचालयों का निर्माण कार्य चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि वे यह सुनिश्चित करें कि शहरी और ग्रामीण इलाकों के हर स्कूल मेंचाहे वह सरकारी हो या निजी लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग, चालू हालत वाले शौचालय हों, जिनमें पानी की सुविधा भी उपलब्ध हो।  सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि हर स्कूल में छात्राओं को मुफ्त में सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराए जाएं। यह फैसला एक याचिका पर आया था, जिसमें केंद्र सरकार की 'स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए मासिक धर्म स्वच्छता नीति' को पूरे देश में लागू करने की मांग की गई थी। यह नीति कक्षा 6 से 12 तक के सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के लिए है।
 

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