
नारी डेस्क: उत्तर प्रदेश में बिजली उपभोक्ताओं के लिए जून का महीना महंगा साबित हो सकता है। राज्य में बिजली बिल पर अतिरिक्त फ्यूल सरचार्ज लगाए जाने का फैसला किया गया है, जिसके बाद लोगों को पहले की तुलना में ज्यादा भुगतान करना होगा। बढ़ती बिजली उत्पादन और खरीद लागत के बीच यह फैसला लिया गया है, जिसका सीधा असर लाखों उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा।
जून के बिल में जुड़ जाएगा अतिरिक्त शुल्क
उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPPCL) ने फ्यूल एंड पावर परचेज कॉस्ट एडजस्टमेंट सरचार्ज (FPPAS) लागू करने का निर्णय लिया है। इसके तहत उपभोक्ताओं को अपने बिजली बिल पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त राशि चुकानी होगी। यह शुल्क जून 2026 के बिल से लागू किया जाएगा।सरल शब्दों में समझें तो यदि किसी उपभोक्ता का बिजली बिल अभी 1000 रुपये आता है तो नई व्यवस्था लागू होने के बाद उसे लगभग 1100 रुपये का भुगतान करना पड़ सकता है, बशर्ते उसकी बिजली खपत समान रहे।
आखिर क्यों बढ़ाया गया फ्यूल सरचार्ज?
बिजली कंपनियों का कहना है कि बिजली उत्पादन और खरीद की लागत में लगातार बढ़ोतरी हुई है। कोयला, ईंधन और अन्य संसाधनों की कीमत बढ़ने से बिजली उत्पादन महंगा हो गया है। इसके अलावा बाहरी स्रोतों से बिजली खरीदने का खर्च भी बढ़ा है। इसी अतिरिक्त लागत की भरपाई के लिए फ्यूल सरचार्ज लगाया जा रहा है, ताकि बिजली वितरण कंपनियों पर आर्थिक दबाव कम किया जा सके। लाखों उपभोक्ताओं पर पड़ेगा असर इस फैसले का असर घरेलू, व्यावसायिक और अन्य सभी श्रेणी के उपभोक्ताओं पर पड़ने वाला है। ऐसे समय में जब कई इलाकों में बिजली कटौती और बढ़ती गर्मी की समस्या बनी हुई है, बिजली बिल में बढ़ोतरी लोगों की चिंता और बढ़ा सकती है।
अधिकारियों को जारी किए गए निर्देश
उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन के डायरेक्टर (आईटी) की ओर से संबंधित अधिकारियों को पत्र जारी कर इस व्यवस्था को लागू करने के निर्देश दिए गए हैं। पत्र में कहा गया है कि नियामक प्रावधानों के अनुसार जून 2026 से FPPAS लागू किया जाना है और इसे सभी श्रेणियों के उपभोक्ताओं के लिए लागू किया जाएगा।
उपभोक्ताओं की बढ़ेगी चिंता
गर्मी के मौसम में बिजली की खपत पहले ही काफी बढ़ जाती है। ऐसे में फ्यूल सरचार्ज जुड़ने से उपभोक्ताओं के मासिक खर्च पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। खासकर मध्यम वर्ग और सीमित आय वाले परिवारों को इसका सीधा असर महसूस हो सकता है। बिजली विभाग का कहना है कि यह कदम बढ़ती लागत को संतुलित करने के लिए जरूरी है, लेकिन उपभोक्ताओं के लिए यह फैसला निश्चित रूप से राहत देने वाला नहीं माना जा रहा है।