नारी डेस्क: कुछ बातचीत ऐसी होती हैं जिनसे चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। वहीं कुछ ऐसी भी होती हैं जिनसे लगता है कि जैसे कुछ छिन गया हो। भले ही ऐसी बातचीत सिर्फ़ पांच या दस मिनट की हो, लेकिन उसके बाद मन भारी हो जाता है, ध्यान भटकने लगता है और आसान काम भी मुश्किल लगने लगते हैं। बहुत से लोग इस एहसास को "बहुत ज़्यादा संवेदनशील" होने का नतीजा मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन मनोविज्ञान (साइकोलॉजी) इसकी एक अलग वजह बताता है।

हर बात में छिपी होती है भावनाएं
इंसानों के बीच बातचीत सिर्फ़ शब्दों का आदान-प्रदान नहीं होती। हर बातचीत में भावनाएं, चेहरे के हाव-भाव, आवाज़ का लहज़ा, बीच-बीच में रुकना और बिना कहे जताई गई उम्मीदें भी शामिल होती हैं। हमारा दिमाग़ इन सभी संकेतों को समझने और प्रोसेस करने के लिए लगातार काम करता रहता है, और कभी-कभी यह अदृश्य काम मानसिक रूप से थका देने वाला हो जाता है। ISIC मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल, दिल्ली की साइकोलॉजिस्ट सुश्री प्रेरणा पंत का कहना है कि यह एक ऐसी स्थिति है जिसका अनुभव हममें से कई लोगों ने किया है। भले ही बातचीत छोटी हो सिर्फ़ कुछ मिनटों की लेकिन उसके बाद आप मानसिक रूप से थका हुआ, भावनात्मक रूप से बोझिल या शायद चिड़चिड़ा भी महसूस करते हैं।
कुछ बातें दिमाग में डालती हैं बोझ
हर मुश्किल भावनात्मक बातचीत नुकसानदायक नहीं होती। हर किसी की ज़िंदगी में मुश्किल दिन, दुख के पल, काम का तनाव या पारिवारिक समस्याएं आती हैं। समस्या तब शुरू होती है जब भावनात्मक असंतुलन कभी-कभार होने वाली घटना के बजाय एक आदत या पैटर्न बन जाता है। हम हमेशा लोगों के चेहरे के भाव, आवाज़, बॉडी लैंग्वेज और भावनाओं को समझते हैं। अगर कोई व्यक्ति लगातार शिकायत करता है, आलोचना करता है, हावी होने की कोशिश करता है या अपनी सारी चिंताएं सामने रखता है और उम्मीद करता है कि हम उन्हें बिना उन्हें बात करने की जगह दिए ही सुन लें, तो हमारे दिमाग पर ज़्यादा ज़ोर पड़ता है। साइकोलॉजिस्ट इसे 'इमोशनल फटीग' (भावनात्मक थकान) कहते हैं। यह बिना कोई शारीरिक कसरत किए भी पूरी तरह से ऊर्जा खत्म हो जाने जैसा महसूस होता है।इस तरह की बातचीत अक्सर थका देने वाली होती है क्योंकि इसमें भावनाओं का बहुत कम आदान-प्रदान होता है।

क्या है इमोशनल लोड?
साइकोलॉजिस्ट कभी-कभी इसे 'इमोशनल लोड' (भावनात्मक बोझ) कहते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि बात करने वाले की नीयत खराब है। हो सकता है कि वे सचमुच किसी मुश्किल दौर से गुज़र रहे हों। लेकिन जब एक ही व्यक्ति हर बातचीत का भावनात्मक बोझ उठाता रहता है, तो स्वाभाविक रूप से थकान हो सकती है। हर मुश्किल बातचीत नुकसानदायक नहीं होती। हर किसी की ज़िंदगी में मुश्किल दिन, दुख के पल, काम का तनाव या परिवार की परेशानियां आती हैं। समस्या तब शुरू होती है जब भावनाओं का असंतुलन कभी-कभार होने वाली बात के बजाय एक आदत बन जाता है। सुश्री पंत ने कहा, "एक और कारण यह है कि इंसान अपने आस-पास के लोगों की भावनाओं को 'मिरर' (अपना) करने लगते हैं। जब कोई व्यक्ति हर समय बेचैन, गुस्से में, नकारात्मक या भावनात्मक रूप से परेशान महसूस करता है, तो हम अनजाने में उन भावनाओं को अपना सकते हैं। इसीलिए कुछ लोगों के साथ रहने का असर पूरे दिन हमारे मूड पर रहता है।"
अपनी इमोशनल हेल्थ का भी रखें ख्याल
इसीलिए हो सकता है कि कोई व्यक्ति दिन की शुरुआत तो ठीक-ठाक करे, लेकिन थोड़ी सी बातचीत के बाद असामान्य रूप से तनावग्रस्त या भावनात्मक रूप से खाली महसूस करे। थका हुआ महसूस करने का मतलब यह नहीं है कि कोई व्यक्ति 'टॉक्सिक' (हानिकारक) है सोशल मीडिया ने "टॉक्सिक" शब्द को बहुत आम बना दिया है। फिर भी, मनोवैज्ञानिक किसी को यह लेबल इतनी जल्दी न देने की सलाह देते हैं। इमोशनल एनर्जी को बचाकर रखना मानसिक सेहत का ही एक हिस्सा है। इमोशनल हेल्थ का ध्यान रखने का मतलब मुश्किल बातचीत से बचना नहीं है। इसका मतलब है यह पहचानना कि कब आपकी इमोशनल एनर्जी खत्म हो रही है। अच्छी बातचीत दोनों तरफ़ से होती है। सभी रिश्तों में दोनों लोगों को अपनी बात कहने, सुनने और सपोर्ट महसूस करने की आज़ादी होनी चाहिए। जब आपको लगे कि किसी खास व्यक्ति के साथ सारी बातचीत सिर्फ़ उनकी समस्याओं, आलोचना और नेगेटिविटी के बारे में ही होती है, तो इमोशनल बाउंड्रीज़ (भावनात्मक सीमाएं) तय करना बिल्कुल सही है। क्योकि अपनी इमोशनल हेल्थ का ध्यान रखना स्वार्थ नहीं है, यह आपकी भलाई के लिए ज़रूरी है।"