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मंजिलें और भी हैं... शकीला शेक के संघर्ष से कामयाबी तक की कहानी

  • Edited By Anjali Rajput,
  • Updated: 25 Sep, 2020 03:57 PM
मंजिलें और भी हैं... शकीला शेक के संघर्ष से कामयाबी तक की कहानी

महिलाएं आज किसी भी फील्ड में पीछे नहीं हैं। अपनी मेहनत और स्मार्टनेस के कारण वह हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर रही हैं। ऐसी ही एक कहानी है आर्टिस्ट शकीला शेक की, जिन्होंने अपनी गृहस्थ भूमिका से हटकर अपनी एक अलग पहचान बनाई। आइए जानते हैं सभी महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी शकीला शेक की कहानी।

 

गृहस्थ जीवन छोड़ शुरू किया आर्टिस्ट बनने का सफर

शकीला शेक कोलकाता से 30 किमी दूर स्थित एक गांव में रहती थी। आम महिलाओं के तरह वह भी अपने परिवार को खाना बनाकर देती थी और घर का काम करती थी। मगर एक दिन अचानक प्रेरणा मिलने पर शकीला ने अपना गृहस्थ जीवन छोड़ा एक मशहूर और कामयाब आर्टिस्ट के रूप में पहचान बनाई और आज वह एक विश्व प्रसिद्ध कलाकार है।

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मां सड़को पर बेचती थीं सब्जी

शकीला बहुत छोटी थी जब उनके पिता उन्हें छोड़ कर चले गए थे। पिता के छोड़ने के बाद उनकी मां सब्जी बेचने के लिए 40 किलोमीटर मोगरा घाट से चलकर कोलकाता तक जाती थी। शकीला का कहना है कि उनकी मां उन्हें साथ तो ले जाती थी लेकिन कोई काम करने नहीं देती थी। वह फुटपाथ पर बैठकर ट्राम और बसों को देखा करती थी और कई बार तो काम के लिए उन्हें सड़को पर ही सोना पड़ता था।

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बलदेव राज ने बाबा बन उठाया पढ़ाई का जिम्मा

बलदेव राज पनेसर, जोकि सरकारी कर्मचारी और चित्रकार थे, वह गरीब बच्चों को अंडे, चॉकलेट, पेंसिल और पत्रिकाएं दिया करते थे लेकिन शकीला ने उनसे कुछ भी नहीं लिया। उनका कहा कि 'मैंने किसी अजनबी से कभी कुछ भी स्वीकार नहीं किया था, इसलिए मैं ये नहीं ले सकती'। इसके बाद बलदेव राज पनेसर ने उन्हें पढ़ाने के लिए उनकी मां को राजी किया, जिसके बाद वह शकीला के लिए 'बाबा' बन गए।

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पति की मदद के लिए शुरू किया पॉलिथीन बैग बनाना

कुछ समय बाद शकीला की मां ने उनकी शादी अकबर शेख नाम के शख्स से कर दी, जोकि पहले से ही शादीशुदा थे। वह भी कोलकत्ता की सड़कों पर सब्जी बेचा करते थे लेकिन उनकी कमाई दो बीवीओं के लिए पूरी नहीं पड़ती थी। इसके बाबा उन्होंने अपने पति की मदद करने के लिए बाबा की सलाह से पॉलिथीन बैग बनाने शुरू किए।

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सब्जियों से करती हैं चित्रकारी

एक दिन, बाबा ने अपनी प्रदर्शनी देखने के लिए शकीला और अकबर को आमंत्रित किया। उनके चित्रों को शकीला ने उन्हें बहुत उत्सुकता से देखा। प्रदर्शनी देखने के बाद शकीला ने अकबर से कार्डबोर्ड शीट्स और कलर्ड पेपर्स मंगवाए। इसके बाद उन्होंने सब्जियों का कोलार्ज बनाना शुरू किया। उनके कोलार्ज को देखकर बाबा ने अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को कोलार्ज बनवाने के लिए शकीला जी के पास जाने के लिए कहा।

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मिल चुके हैं कई अवॉर्ड्स

उन्होंने सब्जियों से लेकर घरेलू हिंसा तक की कहानी को केनवस पर उतारा, जोकि लोगों को काफी पसंद आए। इसके बाद उन्होंने 1990 में अपनी पहली प्रदर्शनी में, जिसमें शकीला ने 70,000 रुपए कमाए। आज उनकी कला फ्रांस, जर्मनी, नॉर्वे और अमेरिका जैसे शहरों में बिकती है। उन्हें अपनी कला के लए कई ऑवार्ड भी मिल चुके हैं। अपनी इस सफलता का कारण वह अपने टेलेंट के साथ-साथ अकबर और बाबा को भी मानती है। शकीला शेख जी का जीवन हर महिला के लिए प्रेरणा है।
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