
नारी डेस्क : जिंदगी में कई बार ऐसी परिस्थितियां आ जाती हैं, जिनकी वजह से हम लगातार तनाव में रहने लगते हैं। लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव धीरे-धीरे मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है और कुछ लोगों में डिप्रेशन जैसी समस्या भी पैदा हो सकती है। ऐसे में व्यक्ति चिड़चिड़ा रहने लगता है, किसी काम में मन नहीं लगता और रोजमर्रा की जिंदगी भी मुश्किल लगने लगती है। इसलिए समय रहते सही इलाज और विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहद जरूरी है। इसी दिशा में अब भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर और जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के शोधकर्ताओं ने एक नया मॉडल विकसित किया है, जो यह अनुमान लगाने में मदद कर सकता है कि डिप्रेशन के मरीज पर कौन-सी एंटीडिप्रेसेंट दवा असर कर सकती है। खास बात यह है कि यह मॉडल इलाज शुरू होने के महज 7 से 10 दिनों में दवा के संभावित असर का अनुमान लगाने में मदद कर सकता है।
दवा का असर जानने में लगते हैं 4-6 सप्ताह
डिप्रेशन एक आम मानसिक स्वास्थ्य समस्या है, लेकिन हर मरीज पर एक ही एंटीडिप्रेसेंट दवा समान तरीके से काम नहीं करती। डॉक्टरों को अक्सर दवा शुरू करने के बाद कई सप्ताह तक इंतजार करना पड़ता है ताकि यह पता चल सके कि मरीज में सुधार हो रहा है या दवा बदलने की जरूरत है। शोधकर्ताओं का विकसित किया गया मॉडल मस्तिष्क और पेट की विद्युत गतिविधियों के संकेतों को मरीज के लक्षणों से जोड़कर दवा के संभावित असर का अनुमान लगाने की कोशिश करता है। शुरुआती निष्कर्षों के अनुसार, इससे इलाज के शुरुआती 7-10 दिनों में महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है।

206 लोगों पर किया गया अध्ययन
इस रिसर्च में कुल 206 प्रतिभागियों को शामिल किया गया। इनमें 144 ऐसे मरीज थे, जिन्होंने इससे पहले डिप्रेशन का इलाज नहीं कराया था। इलाज शुरू होने के दौरान प्रतिभागियों के मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि को EEG और पेट की विद्युत गतिविधि को EGG के जरिए रिकॉर्ड किया गया। करीब एक सप्ताह बाद इन संकेतों को दोबारा दर्ज किया गया। इसके बाद मरीजों के लक्षणों और इन जैविक संकेतों का विश्लेषण किया गया।
मॉडल ने दिखाई अच्छी सटीकता
शोधकर्ताओं के अनुसार, शुरुआती जांच में मॉडल उन मरीजों में से करीब 84% की पहचान कर सका, जिन पर दवा का पर्याप्त असर नहीं हुआ। वहीं, दवा से लाभ पाने वाले करीब 78% मरीजों की भी सही पहचान की गई। इसके बाद मॉडल को अलग मरीजों के समूह पर भी जांचा गया। वहां इसकी कुल सटीकता करीब 77.3% रही। नए समूह में दवा का पर्याप्त असर न पाने वाले करीब 71% मरीजों की सही पहचान हुई, जबकि दवा से लाभ पाने वाले लगभग 80% मरीजों को मॉडल ने सही तरीके से पहचान लिया।

हर मरीज के लिए हो सकता है ज्यादा व्यक्तिगत इलाज
इस शोध की खास बात यह है कि यह सिर्फ मरीज के लक्षणों पर निर्भर नहीं करता, बल्कि दिमाग और पेट की जैविक गतिविधियों को भी विश्लेषण में शामिल करता है। भविष्य में ऐसी तकनीक डॉक्टरों को यह तय करने में मदद कर सकती है कि किस मरीज के लिए कौन-सा उपचार ज्यादा उपयुक्त हो सकता है। हालांकि, यह मॉडल अभी शोध और मूल्यांकन के स्तर पर है। इसे नियमित चिकित्सा उपचार का विकल्प नहीं माना जा सकता और दवा शुरू करने या बदलने का फैसला डॉक्टर की सलाह से ही किया जाना चाहिए।