नारी डेस्क: प्रेग्नेंसी के दौरान हर महिला चाहती है कि उसकी डिलीवरी सुरक्षित तरीके से हो और बच्चा स्वस्थ रहे। लेकिन जब नॉर्मल डिलीवरी का समय आता है, तो शरीर में होने वाले कई बदलावों को लेकर मन में सवाल उठने लगते हैं। कुछ बातें ऐसी भी होती हैं, जिनके बारे में महिलाएं खुलकर बात करने में झिझकती हैं। इन्हीं में से एक है लेबर पेन के दौरान पॉटी आ जाना। कई महिलाओं को लगता है कि ऐसा होना किसी परेशानी का संकेत है या इससे बच्चे को नुकसान पहुंच सकता है। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? गाइनेकोलॉजिस्ट ने नॉर्मल डिलीवरी से जुड़ी कुछ अहम बातें बताई हैं, जिनके बारे में हर गर्भवती महिला और प्रेग्नेंसी प्लान कर रही महिलाओं को जानकारी होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि डिलीवरी के दौरान शरीर में होने वाले कुछ बदलाव सामान्य हो सकते हैं और इनके लिए पहले से मानसिक रूप से तैयार रहना जरूरी है।
नॉर्मल डिलीवरी के दौरान पॉटी आना क्या सामान्य है
डिलीवरी के समय महिला को पॉटी आ जाना कोई असामान्य बात नहीं है। दरअसल, जब बच्चा जन्म लेने के लिए नीचे की ओर आता है, तो उसके सिर का दबाव मलाशय यानी रेक्टम पर पड़ सकता है। इस वजह से महिला को पॉटी करने जैसा महसूस हो सकता है और कभी-कभी स्टूल पास भी हो जाता है। डिलीवरी के दौरान महिला को बच्चे को बाहर निकालने के लिए जोर लगाना पड़ता है। इस प्रक्रिया में शरीर की मांसपेशियों पर दबाव पड़ता है, जिसके कारण पॉटी आ सकती है। यह लेबर के दौरान होने वाली एक सामान्य घटना है। ऐसी स्थिति में महिला को शर्मिंदा होने या घबराने की जरूरत नहीं है। मेडिकल टीम के लिए यह कोई नई या असामान्य बात नहीं होती। डॉक्टर और नर्स इस स्थिति को सामान्य तरीके से संभालते हैं और उनका पूरा ध्यान मां और बच्चे की सुरक्षा पर रहता है। हालांकि, केवल पॉटी आने के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि बच्चे का जन्म तुरंत होने वाला है। डिलीवरी कितनी आगे बढ़ी है, इसका पता अन्य लक्षणों और मेडिकल जांच से चलता है।

बच्चे के जन्म के बाद भी डिलीवरी का एक हिस्सा बाकी रहता है
अक्सर महिलाएं सोचती हैं कि बच्चे के पैदा होते ही डिलीवरी की प्रक्रिया पूरी हो जाती है, लेकिन ऐसा नहीं है। बच्चे के जन्म के बाद प्लेसेंटा यानी गर्भनाल से जुड़ा अंग, जिसे अपरा भी कहा जाता है, बाहर निकलता है। इसे डिलीवरी का तीसरा चरण कहा जाता है। प्लेसेंटा गर्भावस्था के दौरान बच्चे को ऑक्सीजन और पोषण पहुंचाने में मदद करता है। बच्चे के जन्म के बाद इसका बाहर निकलना जरूरी होता है। इस प्रक्रिया में कुछ समय लग सकता है और मेडिकल टीम मां की स्थिति पर नजर रखती है। कई बार डॉक्टर या नर्स महिला को हल्का जोर लगाने या निर्देशों के अनुसार खांसने के लिए कह सकते हैं। यह स्थिति के हिसाब से किया जाता है। अगर प्लेसेंटा बाहर आने में देरी हो या अधिक ब्लीडिंग हो, तो डॉक्टर जरूरी कदम उठाते हैं। इसलिए बच्चे के जन्म के बाद भी मेडिकल टीम के निर्देशों का पालन करना जरूरी है।
डिलीवरी के बाद अचानक कंपकंपी क्यों होने लगती है
बच्चे को जन्म देने के बाद कुछ महिलाओं को अचानक कंपकंपी महसूस हो सकती है। कई बार शरीर तेजी से कांपने लगता है, जिससे महिला और उसके परिवार के लोग घबरा जाते हैं। हालांकि, डिलीवरी के बाद ऐसा होना कई महिलाओं में देखा जाता है और हर बार यह किसी गंभीर समस्या का संकेत नहीं होता। इसके पीछे हार्मोनल बदलाव, शरीर के तापमान में बदलाव, थकान, तनाव और डिलीवरी के दौरान शरीर पर पड़े दबाव जैसे कई कारण हो सकते हैं। कुछ मामलों में खून की अधिक कमी या दूसरी चिकित्सकीय समस्याएं भी कंपकंपी का कारण बन सकती हैं। इसलिए कंपकंपी को हमेशा सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। अगर इसके साथ तेज बुखार, बहुत ज्यादा कमजोरी, चक्कर, सांस लेने में परेशानी, तेज ब्लीडिंग या बेहोशी जैसे लक्षण हों, तो तुरंत मेडिकल टीम को बताना चाहिए। डिलीवरी के बाद डॉक्टर मां के ब्लड प्रेशर, पल्स, ब्लीडिंग और दूसरी जरूरी चीजों की जांच करते हैं, ताकि किसी परेशानी का समय पर पता लगाया जा सके।
लेबर के दौरान शरीर में होने वाले बदलावों से घबराएं नहीं
नॉर्मल डिलीवरी के दौरान महिला के शरीर को काफी मेहनत करनी पड़ती है। गर्भाशय में संकुचन यानी कॉन्ट्रैक्शन होते हैं, बच्चा धीरे-धीरे नीचे की ओर आता है और महिला को जोर लगाने की जरूरत पड़ सकती है। इस दौरान शरीर में दबाव महसूस होना, पसीना आना, थकान होना और पॉटी करने जैसा एहसास होना संभव है। ये अनुभव हर महिला में एक जैसे नहीं होते। किसी की डिलीवरी जल्दी हो जाती है, जबकि किसी को अधिक समय लग सकता है। इसलिए दूसरी महिलाओं के अनुभवों से अपनी डिलीवरी की तुलना नहीं करनी चाहिए। सबसे जरूरी बात यह है कि लेबर के दौरान डॉक्टर और नर्स जो निर्देश दें, उन्हें ध्यान से सुनें। अगर दर्द असहनीय लगे, अचानक कोई नया लक्षण दिखाई दे या मन में कोई डर हो, तो मेडिकल टीम को तुरंत बताएं।

प्रेग्नेंसी के दौरान डिलीवरी के लिए खुद को कैसे तैयार करें?
डिलीवरी को लेकर डर या घबराहट होना स्वाभाविक है, खासकर पहली बार मां बनने वाली महिलाओं के लिए। लेकिन सही जानकारी और डॉक्टर से बातचीत इस डर को कम करने में मदद कर सकती है।
डॉक्टर से सवाल पूछें: लेबर पेन, नॉर्मल डिलीवरी और अस्पताल में होने वाली प्रक्रिया के बारे में पहले से जानकारी लें।
डिलीवरी प्लान पर चर्चा करें: अपनी सेहत, गर्भावस्था की स्थिति और उपलब्ध विकल्पों के बारे में डॉक्टर से बात करें।
शरीर के संकेतों को समझें: अगर पानी की थैली फट जाए, ब्लीडिंग हो या बच्चे की हलचल कम महसूस हो, तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें।
मानसिक रूप से तैयार रहें: डिलीवरी के दौरान शरीर में कुछ ऐसे बदलाव हो सकते हैं, जिनके बारे में पहले जानकारी होना आपको सहज महसूस करा सकता है।
मेडिकल टीम पर भरोसा रखें: डिलीवरी के समय शर्म या झिझक के कारण अपनी परेशानी छिपाएं नहीं। डॉक्टरों को हर जरूरी बात बताना मां और बच्चे की सुरक्षा के लिए अहम है।
आखिर में क्या ध्यान रखें
नॉर्मल डिलीवरी के दौरान पॉटी आ जाना कई महिलाओं के साथ हो सकता है और आमतौर पर यह अपने आप में खतरे का संकेत नहीं है। बच्चे के जन्म के बाद प्लेसेंटा का बाहर निकलना भी डिलीवरी का जरूरी हिस्सा है। इसी तरह, डिलीवरी के बाद हल्की कंपकंपी कुछ महिलाओं में सामान्य हो सकती है, लेकिन इसके साथ दूसरे गंभीर लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर की मदद लेनी चाहिए।
हर महिला की प्रेग्नेंसी और डिलीवरी अलग होती है। इसलिए किसी एक अनुभव को सभी पर लागू नहीं किया जा सकता। सही जानकारी रखें, डॉक्टर से खुलकर बात करें और डिलीवरी के दौरान शरीर में होने वाले बदलावों को लेकर बेवजह शर्मिंदा न हों। मां और बच्चे की सुरक्षा हमेशा सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।