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ब्लड कैंसर से नहीं जाएगी अब किसी की जान, 1 गोली करेगी बचाव!

  • Edited By khushboo aggarwal,
  • Updated: 15 Oct, 2019 03:47 PM
ब्लड कैंसर से नहीं जाएगी अब किसी की जान, 1 गोली करेगी बचाव!

नीले रंग की गोली सिलडेनफिल जिसे वियाग्रा या ब्लू पिल के नाम से भी जाना जाता है का इस्तेमाल पुरुषों में होने वाली समस्या इरैक्टाइल डिस्फंक्शन को ठीक करने में किया जाता है लेकिन जल्द ही इस दवा का इस्तेमाल ल्यूकीमिया यानी ब्लड कैंसर और कई दूसरे तरह के कैंसर के मरीजों के इलाज में भी किया जाएगा।

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दरअसल, वियाग्रा को जब विकसित किया गया था उस वक्त ओरिजनली इस दवा का मकसद इरैक्टाइल डिस्फंक्शन की समस्या का इलाज करना नहीं था। इसकी जगह सिलडेनफिल को इसलिए तैयार किया था ताकि वह पल्मनरी आरट्रियल हाइपरटैंशन के लक्षणों का इलाज कर सके। यह एक तरह की हाई ब्लड प्रैशर जैसी बीमारी है जो हार्ट और लंग्स के बीच होती है।

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रक्त धमनियों को चौड़ा करने में मदद करती है वियाग्रा

पल्मनरी आरट्रियल हाइपरटैंशन एक ऐसी स्थिति है जिसमें लंग्स में हाइपरटैंशन की स्थिति बन जाती है। ऐसे में हृदय से खून को फेफड़ों तक पहुंचाने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। इस स्थिति में सिलडेनफिल या वियाग्रा दवा, फेफड़ों में फोस्पोडायस्टेरियस 5 एंजाइम पर काम करती है और ब्लड वेसल्स यानी रक्त धमनियों को चौड़ा करने और लंग्स को रिलैक्स करने में मदद करती है।

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बोन मैरी में स्टैम सैल्स रिलीज करती है वियाग्रा

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया, साता क्रूज की एक रिसर्च टीम ने बताया कि इरैक्टाइल डिस्फंक्शन की समस्या सुलझाने में मदद करने वाली दवा वियाग्रा, ब्लड स्ट्रीम के बोन मैरो में स्टैम सैल्स को रिलीज करने में मदद करती है जिससे कलैक्शन आसान हो जाता है। स्टैम सैल रिपोर्ट नाम के जर्नल में प्रकाशित स्टडी में बताया कि सैनोफी के स्टैम सैल मोबिलाइजर मोजोबिल को वियाग्रा के साथ पेयर करके दिया जाए तो यह बेहतर काम करता है। हालांकि अभी तक यह रिसर्च सिर्फ चूहों पर हुई है लेकिन इसे जल्द इंसानों पर भी किए जाने की बात कही जा रही है।

पानी में वियाग्रा की छोटी सी डोज कम करती है कोलोरैक्टल कैंसर

चूहों पर वियाग्रा के इफैक्ट्स पर स्टडी कर रहे रिसर्चर ने दावा किया कि पीने के पानी में वियाग्रा की छोटी सी डोज को रोजाना शामिल किया जाए तो उनमें कोलोरैक्टल कैंसर होने के खतरे को कई गुना कम किया जा सकता है। हालांकि अब तक यह रिसर्च सिर्फ जानवरों पर हुई है लेकिन जल्द ही मरीजों पर भी इसका क्लीनिकल ट्रायल किया जाएगा और वैसे मरीज जिन्हें कोलोरैक्टल कैंसर की फैमिली हिस्ट्री में यह बीमारी है, वैसे लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी।

 

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