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शहीद की पत्नि ने अंधेरे से लड़कर दूसरों को दिए उजाले

  • Edited By Anjali Rajput,
  • Updated: 02 Mar, 2019 06:05 PM
शहीद की पत्नि ने अंधेरे से लड़कर दूसरों को दिए उजाले

पुलवामा हमले में 46 जवानों ने अपनी जान गवां दी थी। सेना पर घात लगाकर किए गए इस हमले ने कई परिवारों को बेसहारा कर दिया, कई मां से उनकी जिंदगी का नूर, पत्नियों से उनका जीवनसाथी और बच्चों से उनके पिता का साया छीन लिया। ऐसे मुश्किल वक्त में शहीद के परिवारों के लिए बहुत मुश्किल घड़ी होती है लेकिन देश की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान करने वाले जवानों की पत्नियां भी उनसे कम बहादुर नहीं होतीं। एक बड़े ऑपरेशन के दौरान शहीद हुए सैन्य अफसर की पत्नि की ऐसी ही दास्तां आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं। इस बेहद स्ट्रॉन्ग और इंस्पिरेशनल वुमन का नाम है 'सलमा शफीक गोरी'। तो आइए जानते हैं इनकी जिंदगी की कहानी-

 

बहादुर सैनिक अफसर की बहादुर पत्नि

सलमा का कहना है कि जब वह 19 साल की थी, तभी उनकी शादी  'कैप्टन शफीक गोरी' से हो गई थी। शुरुआत में सलमा के लिए सब कुछ बहुत मुश्किल था क्योंकि हमेशा सफर और लंबे अरसे तक अकेले रहना बहुत बड़ी बात थी। जब सलमा के पति को उनकी मुश्किल का अहसास हुआ तब उन्होंने अपनी पत्नि को अफसर की पत्नि होने का मतलब समझाया। इनकी शादी 1991 में हुई थी। उस समय मोबाइल नहीं हुआ करते थे इसलिए वह एक-दूसरे को चिट्ठियां लिखा करते थे। पति पत्नि में अक्सर चिट्ठी से ही बातें होती थी लेकिन सलमा ने सोचा नहीं थी कि कभी सिर्फ चिट्ठियां ही रह जाएंगी उनकी यादों के तौर पर।

 

पहला प्यार भारत देश

शादी के बाद पति की पोस्टिंग कई जोखिम वाली जगहों पर होती थी। काफी लंबे वक्त तक पोस्ट्स पर रहते हुए भी सलमा ने कभी डर का सामना नहीं किया, क्योंकि तब तक सलमा बहुत स्ट्रोंग हो चुकी थी। वह जानती थी कि उनके पति के लिए पहला प्यार देश है और उसके बाद दूसरे नंबर पर ही पत्नि और बच्चों का प्यार था।

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इस बात का रह गया अफसोस

सलमा के जीवन में ऐसा पल भी आया जब उनकी अपने पति से आखरी बात हुई थी। उनकी पोस्टिंग श्रीनगर में हुई थी और हाई रिस्क एरिया होने की वजह से पत्नि और बच्चे साथ नहीं रह सकते थे। उस समय पति का फोन आया और उन्होनें बच्चों का हाल-चाल पुछा। कैप्टन शरीक बच्चों से बात करना चाहते थें लेकिन शोर गुल की वजह से सलमा बच्चों से उनकी बात नहीं करवा पाई। सलमा को इस बात का आज भी अफसोस होता है कि काश उस समय बच्चों से बात करवा दी होती।

 

दिल-दहलाने वाली खबर

1 जुलाई, 2001 की बात है। सुबह 6.30 पर जब आर्मी अफसर की पत्नियों ने घर आकर सलमा को यह खबर सुनाई कि कैप्टन शरीफ शहीद हो गए है तो कुछ देर तक तो सलमा को यकीन ही नहीं हुआ। उसी दिन सलमा को अपने पति की आखरी चिट्ठी मिली थी। दूसरे दिन सलमा एयरपोर्ट पर उन्हें आखिरी बार लेने पहुंची। इस बार वह भारतीय तिरंगे में लिपटे एक बॉक्स में थे। वह पूरी तरह टूट गई थीं।

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महिला सशक्तीकरण के काम में हुई शामिल

सलमा ने अपने पति कैप्टन शरीफ की यूनिफॉर्म और सिविल कपड़ों को आज भी बिना धोएं संभाल कर रखा है ताकि कपड़ों से उनकी खुशबू कभी भी खत्म ना हों। उनकी लिखी चिट्ठियां वह आज भी पढ़ती है। वह अपने बच्चों के लिए मां और बाप दोनों की भूमिका निभाती है। आज वह शहीद जवानों के परिवारों के वेलफेयर और शहीदों की विधवाओं के सशक्तीकरण के लिए कर्नाटक में काम करती हैं।

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