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अनकही बातें: क्या सचमुच पति की हर बात मानना ही है खुशहाल शादी?

  • Edited By Anjali Rajput,
  • Updated: 29 Aug, 2019 01:00 PM
अनकही बातें: क्या सचमुच पति की हर बात मानना ही है खुशहाल शादी?

भारतीय महिलाओं को बचपन से ही हर किसी की बात मानना सिखाया जाता है। जहां शादी से पहले वो माता-पिता के फैसले का सम्मान करते हुए उसे मान ले लेती हैं। वहीं शादी के बाद उसे पति की हर बात माननी पड़ती है, फिर चाहे उसके लिए दिल राजी हो या ना हो। सिर्फ पति ही नहीं, लड़कियों को शादी के बाद ससुराल वालों की भी हर बात माननी पड़ती है लेकिन क्या यह सही है?

 

आज अपनी 'अनकही बातें' की सीरीज में हम इसी टॉपिक पर बात करने जा रहे हैं कि क्या पति व ससुराल वालों की हर बात मानना ही 'हैप्पी मैरिज' का आधार है। चलिए जानते हैं...

लड़कियों को बचपन से सिखाया जाता है हर बात मानना

आज्ञाकारिता एक ऐसा गुण है, जो ज्यादातर भारतीय महिलाओं को बचपन से ही सिखाया जाता है। उन्हें सिखाया जाता है कि पहले उन्हें अपने परिवार और बाद में ससुराल वालों की हर बात सुनें और उसे मानें। भारतीय समाज में यह खुशहाल विवाह की कुंजी है। आज, बहुत सी महिलाएं खुद से पूछ रही हैं कि क्या यह आज्ञाकारिता एक खुशहाल शादी का आधार है?

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क्या यह सचमुच है खुशहाल शादी का राज?

महिलाएं शादीशुदा रिश्ते में अपने पति की इच्छा के अनुरूप ही सबकुछ करती हैं, फिर बात संबंध बनाने की हो या घर के कामों की। मगर यह बिल्कुल गलत है। भले ही महिलाएं अपने पति की हर बात मानें लेकिन दिल ही दिल में वह कई बातें सोचती हैं।

औरतें खुद भी है जिम्मेदार

हालांकि इसमें कुछ गलती औरतों की भी है क्योंकि वो खुलकर बात नहीं करती, वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्हें ऐसा सिखाया नहीं गया। अपनी राय और जरूरतों को बैकबर्नर पर रखकर वो सिर्फ पति के नक्शे कदमों पर ही चलती है लेकिन अगर वो कहीं गलत है या आपको उनका कोई फैसला मंजूर नहीं है तो इसका हल बात करके ही निकाला जा सकता है, चुप रहकर नहीं।

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असली खुशी का मतलब नहीं है खुश रहना

शादी में भले ही आप अपने पति की राय और इच्छाओं को प्राथमिकता को अहमियत देती है लेकिन आप इसे खुशहाल शादी नहीं कह सकती। समझौता करना कभी खुशी नहीं देता, फिर चाहे वो कोई भी रिश्ता क्यों ना हो। किसी भी रिश्ते में समानता का अधिकार हर किसी को है। असली खुशी का मतलब यही है कि दोनों लोग समानता से उस रिश्ते को निभाएं।

सिर्फ पुरूष नहीं है इसके जिम्मेदार

देखा जाए तो पुरूष पूरी तरह से इसके लिए जिम्मेदार नहीं है क्योंकि समाज उसे ऐसा बनाता है। पुरुषों को बचपन से ही सिखाया जाता है कि आक्रामक और दबंग स्वभाव में ही मर्दानगी है, खासकर शादी के रिश्ते में।

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साथी पर निर्भर करती हैं महिलाओं की खुशी

महिलाओं के लिए एक खुशहाल शादी की कीमत इस बात पर निर्भर करती है कि उनका साथी कितना उदार है। कुछ के लिए, यह स्वतंत्रता केवल उनके बेडरूम में रात के समय मैक्सी-ड्रेस पहनने में सक्षम होने के लिए प्रतिबंधित है। जबकि कुछ पुरूष बीवी को बाहर काम करने से भी नहीं रोकते।

क्या आया है कुछ बदलाव...

आज के समय में हम बेटियों को तो स्ट्रांग बना रहे हैं, उन्हें अपने हक के लिए लड़ना सिखा रहे हैं लेकिन पुरुषों को आज भी मर्दानगी का मतबल वही सिखाया जाता है, जो पहले बताया जाता था। यही कारण है आज ज्यादा कपल्स तलाक ले लेते हैं क्योंकि उनके बीच तहजीब से ज्यादा अहंकार आ जाता है।

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अफसोस, कि स्वतंत्रता और सम्मान को लेकर आज भी महिलाओं की सोच में ज्यादा बदलाव नहीं आया है लेकिन शहरी इलाकों में महिलाएं अपने हक के लिए काफी हद तक आवाज उठा लेती हैं। हालांकि ज्यादातर भारतीय कपल्स की कहानी बिल्कुल अलग है क्योंकि कुछ आधुनिक घरों में अभी भी महिलाओं को ऐसे पति की उम्मीद है, जो हर बात के लिए उनका साथ दें, फिर फिर बात चाहे रोमांस की हो, घर में सिर ढंकने या मर्जी के कपड़े पहनने की।

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