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Super Women: भारत की इकलौती महिला कमांडर, आधे सेकंड में शूट करने की देती हैं ट्रेनिंग

  • Edited By Anjali Rajput,
  • Updated: 08 Mar, 2019 02:20 PM
Super Women: भारत की इकलौती महिला कमांडर, आधे सेकंड में शूट करने की देती हैं ट्रेनिंग

आजकल के समय में शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र है जिसमें महिलाओं ने अपनी पहचान ना बनाई हो बल्कि यह कहना भी गलत नहीं होगा कि इस जमाने में महिलाएं पुरुषों को भी बराबर की टक्कर दे रही हैं। चाहें बात बिजनेस हो या आर्मी की। आर्मी में मिसाल कायम करने वाली एक ऐसी ही महिला है-डॉ. सीमा राव। डॉ.राव देश की पहली और इकलौती महिला कमांडो ट्रेनर हैं। इन्हें भारत की ‘सुपर वुमेन’ भी कहा जाता है। 49 साल की सीमा 20 साल से बिना सरकारी मदद के मुफ्त में आर्मी, एयरफोर्स और नेवी समेत पैरामिलिट्री फोर्स के कमांडो को ट्रेनिंग दे रही हैं। उनका नाम उन पांच चुनिंदा महिलाओं में आता है, जिन्हें 'जीत कुन डो' मार्शल आर्ट आता है। इसे ब्रूस ली ने ईजाद किया था। डॉ. राव सशस्त्रबलों के जवानों को रिफ्लेक्स फायर यानी आधे सेकंड में किसी को शूट कर देने की ट्रेनिंग देने के लिए भी जानी जाती हैं। आज इंटरनेशनल वुमन डे (National Women Day) के मौके पर हम आपको उनसे जुड़ी खास बातों के बारे में बताएंगे जिससे आप बहुत कुछ सीख सकती हैं।

 

कमजोरी दूर करने के लिए सीखा था मार्शल आर्ट

डॉ. राव एक इंटरव्यू के दौरान बताती है, " मैं बचपन में बहुत कमजोर थी। इसी कमजोरी को दूर करने के लिए मैंने मार्शल आर्ट्स सीखा और अनआर्म्ड कॉम्बैट में ब्लैक बेल्ट हासिल किया। उसके बाद मेरी शादी मेजर दीपक राव से हुई।"

 

यूं हुई ट्रेनिंग की शुरुआत

डॉ.राव कहती हैं, "एक दिन मॉर्निंग वॉक पर गए तो देखा कि जवान अनआर्म्ड कॉम्बैट की ट्रेनिंग ले रहे हैं। हमने वहां के कमांडेंट ऑफिसर से मिलकर एक वर्कशॉप की योजना बनाई। इस वर्कशॉप के बाद कमांडेंट ने हमें अच्छे रिव्यू दिए और इसी रिव्यू के आधार पर हम मुंबई पुलिस कमिश्नर आरडी त्यागी से मिले। जब त्यागी एनएसजी के महानिर्देशक बने तो उन्होंने हमें अनआर्म्ड कॉम्बैट ट्रेनिंग देने के लिए इनवाइट किया। उन्होंने पैरासेंटर बेंगलुरु में कॉम्बैट ट्रेनिंग के लिए आर्मी का पहला कोर्स शुरू करवाया। धीरे-धीरे आर्मी की अलग-अलग यूनिट्स हमें ट्रेनिंग देने के लिए बुलाने लगीं। इसके बाद मैंने शूटिंग सीखी। मैंने आर्मी की अलग-अलग यूनिट्स में भी इसके डैमाे दिए। इस तरह मैं नेवी, आर्मी, एयरफोर्स, पुलिस फोर्स और पैरामिलिट्री फोर्स को ट्रेनिंग देने लगी।

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ट्रेनिंग का सब्जेक्ट

डॉ.राव का ट्रेनिंग सब्जेक्ट है क्लोज क्वार्टर बैटल(सीक्यूबी)। सीक्यूबी यानी दुश्मन के साथ 30 मीटर के अंदर लड़ाई करना। इसे दो हिस्सो में बांटा जा सकता है।
 

पहला

कमांडो सिचुएशन, जहां दुश्मन की धरती पर जाकर कमांडो ऑपरेशन करते हैं। दुश्मन के इलाके में जाकर और उससे लड़कर जब कमांडो वापस आता है तो उसे 'क्लोज क्वार्टर बैटल' कहते हैं। सीक्यूबी में विस्फोटक इस्तेमाल करना और रूम के अंदर फायरिंग करना भी सिखाया जाता है।

 

दूसरा

काउंटर टेररिज्म ऑपरेशन। इसमें कमांडो आतंकी से 30 मीटर की दूरी से लड़ाई करते हैं। सीक्यूबी का काउंटर टेररिज्म ऑपरेशन और कमांडो मिशन में फायदा होता है। इस ट्रेनिंग में अलग-अलग सब्जेक्ट होते हैं। 

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अनआर्म्ड कॉम्बैट

इसमें बिना हथियार के दुश्मन से लड़ाई करना सिखाया जाता है। 

 

रिफ्लेक्स शूटिंग

जब दुश्मन 30 मीटर के अंदर है तो हमें उसकी गोली लगने से पहले उसे हमारी गोली लगनी चाहिए।

 

ग्रुप शूटिंग

इसमें बताया जाता है कि एक टीम या ग्रुप कैसे दुश्मन पर गोली चला सकते हैं। इसमें सिखाया जाता है कि कैसे एक टीम मिलकर दुश्मन को गोली मारे। 

 

ट्रेनिंग का सफर

अभी तक सीमा जी ने आर्मी, आर्मी की स्पेशल फोर्सेस, कमांडो विंग, एनएसजी, मरीन कमांडो, एयरफोर्स के गरुड़ कमांडो, पैरामिलिट्री फोर्स जैसे- बीएसएफ, आईटीबीपी को ट्रेन किया है। 1997 से लेकर अभी तक अलग-अलग प्रकार की फोर्सेस को उन्होंने ट्रेन किया है। साथ ही 12 राज्यों की पुलिस को भी प्रशिक्षण दिया है।

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ट्रेनिंग का नया तरीका इजात किया

डॉ.राव ने ट्रेनिंग का एक नया तरीका ‘राव सिस्टम ऑफ रिफ्लेक्स फायर’ खोजा है। यह एक अलग तरीके से शूट करने की तकनीक है। जब दुश्मन 30 मीटर के अंदर होता है, तब आप राइफल लेकर बराबर निशाना लगाकर शूट नहीं कर सकते, क्योंकि इसमें 1-2 सेकंड का समय लगता है। जब दुश्मन पास होता है तो हमारे पास 2 सेकंड नहीं होते इसलिए हमें आधे सेकंड के अंदर शूटिंग करनी होती है। यह एक ऐसी तकनीक है जब दुश्मन 30 मीटर के अंदर हो तो राइफल के फोरसाइट से निशाना लगाकर दुश्मन को शूट किया जाता है और इससे सिर्फ आधे सेकंड या उससे भी कम वक्त में टारगेट को हिट किया जा सकता है।

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मार्शल आर्ट जीत कुन डो के बारे में दी जानकारी

डॉ सीमा राव का कहना है कि कराटे और जीत कुन डो पूरी तरह से अलग हैं। जीत कुन डो में किक, पंच, कोहनी और घुटनों का इस्तेमाल होता है। इसमें कुश्ती भी होती है और दुश्मन को जमीन पर लिटाकर हिट करना होता है। कुल मिलाकर, ब्रूस ली के जीत कुन डो में किकिंग, पंचिंग, कुश्ती और मैट फाइटिंग भी है इसलिए ये बाकी मार्शल आर्ट से अलग है। जैसे- ताइक्वांडो में सिर्फ किकिंग है, बॉक्सिंग में पंचिंग है, ग्रेको रैमन रेसलिंग में कुश्ती है लेकिन ब्रूस ली के जीत कुन डो में सभी का मिश्रण है। डॉ.राव ने ब्रूस ली के स्टूडेंट रहे ग्रैंड मास्टर रिचर्ड बूफ्तिलो से जीत कुन डो सीखा है। दुनियाभर की सिर्फ पांच महिलाओं के पास ही जीत कुन डो सीखने का इंस्ट्रक्टर सर्टिफिकेशन है। जिसमें से डॉ.सीमा राव भी एक है।

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महिलाओं के लिए प्रेरणा

डॉ.राव मानती है कि कोई भी महिला, पुरूष के बराबर ही होती है। वह हर वह काम कर सकती है जो एक पुरूष कर सकता है। अगर किसी चीज में बार-बार हार का सामना करना पड़ रहा है तो कोशिश करते रहिए। हिम्मत बना के रखिएं। जीत जरूर मिलेगी। आगे बढ़ना है तो हमेशा दूसरो से अलग सोचे और परंपरा से हटकर सोचिएं।

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