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एशिया की पहली महिला न्यूरोसर्जन थीं डॉ.टीएस कनका, मुश्किल था डॉ बनने का सफर

एशिया की पहली महिला न्यूरोसर्जन थीं डॉ.टीएस कनका, मुश्किल था डॉ बनने का सफर
Views:- Sunday, November 18, 2018-6:16 PM

एशिया की पहली महिला न्यूरोसर्जन डॉ. टीएस कनका का लंबी बीमारी के चलते 86 साल की उम्र में निधन हो गया है। उन्होंने लिंग भेद के बंधन को तोड़ते हुए अपने लक्ष्य को हासिल किया और महिलाओं के लिए प्रेरणा बनी। इस तरह एशिया की पहली महिला न्यूरोसर्जन बनकर इतिहास रचा और देश का नाम रोशन किया था।  

कनका का जन्म 31 मार्च 1932 को चेन्नई में हुआ। पढ़ाई और डॉक्टर बनने के शौंक को पूरा करने के लिए उन्होने 1954 में एमबीबीएस और 1968 में न्यूरोसर्जरी में मास्टर्स ऑफ सर्जरी की डिग्री प्राप्त की। यह वो समय था जब चिकित्सा में सामान्य सर्जरी में पूरी तरह से पुरुषों का कब्जा था। 

जीजा से मिली थी न्यूरोसर्जन बनने की प्रेरणा
डॉ कनका के जीजा(बहन के पति) न्यूरोसर्जन थे, वह जब एमबीबीएस कर रही थीं तब  वह जीजा से हमेशा न्यूरोसर्जन के सवाह ही पूछती रहती थी। तब उनका जवाब होता था कि पहले एमबीबीएस कर लो, फिर न्यूरोसर्जरी सीखा दूंगा। उनकी बातें कनक को न्यूरोसर्जन बनने की प्रेरणा देती थी। 

आसान नहीं था दाखिला लेना
उस समय महिलाओं को सामान्य सर्जरी के लिए मास्टर डिग्री में दाखिला नहीं दिया जाता था। जब डॉ. कनका ने दाखिले का आवेदन दिया तो वह अस्वीकार कर दिया गया। अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए डॉ. कनका ने कई शोध करने की परियोजना की लेकिन उनका सपना न्यूरोसर्जन बनने का था। अपने इसी उद्देश्य के लिए वे आगे बढ़ती रहीं। बार-बार परीक्षा में दाखिला लेने के लिए प्रयास करती रही और 5 बार असफल हुईं लेकिन छठे प्रयास में सफलता प्राप्त की और सर्जन बन गयीं। 

पूरी दुनिया में थीं तीसरी न्यूरोसर्जन
डॉ. कनका पूरी दुनिया में तीसरी महिला न्यूरोसर्जन थीं। उन्हें भारत की पहली महिला न्यूरोसर्जन बनने का गौरव हासिल है। स्टीरियोटैक्टिक सर्जरी (stereotaxy surgery) के लिए काम करने पर उन्हें बहुत प्रशंसा मिली। जब 1962 में भारत-चीन युद्ध हुआ तब युद्ध के दौरान चिकित्सा अधिकारी के रूप में चेन्नई के अस्पताल में काम करते हुए बहुत योगदान दिया। 

रिटायर होने के बाद की गरीबों की सेवा
रिटायर होने के बाद डॉ. कनका गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा करना चाहती थीं। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए उन्होने श्री संतानकृष्ण पदमावती हेल्थ केयर एंड रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना की। जिसमें गरीब लोगों को मुफ्त इलाज की सुविधा दी जाती थी। 

 


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