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परिवार ने नहीं समझी भावनाएं, उसी ट्रांसजेंडर गौरी ने बच्ची को दिया जीवनदान

  • Edited By Sunita Rajput,
  • Updated: 26 Jul, 2020 11:56 AM
परिवार ने नहीं समझी भावनाएं, उसी ट्रांसजेंडर गौरी ने बच्ची को दिया जीवनदान

कौन कहता है कि मां और औलाद का रिश्ता सिर्फ कोख से जुड़ा होता है? मां की ममता तो वह भी हैं जो दूसरे बच्चों के लिए उमड़ती हो, फिर चाहे उस बच्चे के साथ नौ महीने रिश्ता हो या ना हो, ऐसी ही ममता की मिसाल बनी ट्रांसजेंडर कम्यूनिटी से आने वाली गौरी सावंत जिसने एक बच्ची को नया जीवन दिया। उसे यातनाओं के अंधेरे में ढकेले जाने से बचाया और समाज की सोच पर एक करारा थप्पड़ मारा।

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जी हां, हम बात उसी ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट गौरी सावंत की कर रहे हैं, जो लंबे समय से महाराष्ट्र में महिलाओं और अनाथ बच्चों के लिए एक एनजीओ चला रही हैं। मगर यहां तक पहुंचाने के लिए उन्होंने काफी कुछ सहा, लोगों ने उन्हें ‘हिजड़ा’ बोल चिढ़ाया। हर दिन उनका आत्मसम्मान छीना, लेकिन उन्होंने ना तो हार मारी और ना ही जीना छोड़ा। चलिए जानते हैं गौरी सावंत के संघर्ष की कहानी...

गणेश सावंत के रूप में हुआ जन्म 

गौरी का जन्म पुणे के भवानीपीठ में एक मराठी फैमिली में गणेश सावंत के रूप में हुआ। गौरी के पिता एसीपी थे और मां एक हाउस वाइफ। घर में बेटा पैदा हुआ, मां-बाप काफी खुश थे। गौरी जब 5 साल की थी तब उनकी मां की मौत हो गई। जब गौरी मजह 10 साल की थी, तब चाची ने उनसे पूछा कि वे बड़ी होकर क्या बनना चाहती हैं। इसपर उन्होंने जवाब दिया कि मैं आई यानी मां बनना चाहती हूं। गौरी की यह बात सुनकर चाची हंसी और बोलीं कि वे मां नहीं बन सकती हैं, क्योंकि वे एक लड़का हैं। इस बीच उनके पिता का ट्रांसफर मुंबई हुआ और गौरी नए स्कूल जाने लगी।

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गौरी की सच्चाई जानकर कटे-कटे रहने लगे पिता 

गौरी की शारीरिक बनावट लड़कों की तरह थी, लेकिन उनके हाव-भाव किसी लड़की की तरह। जैसे-जैसे समय बितता गया गौरी के पिता को उनकी सच्चाई का पता चला लेकिन वो बोलकर कुछ कह नहीं पाते थे। मगर गौरी से कटे-कटे रहने लगे क्योंकि शायद वो भी इस बात को समझ नहीं पा रहे थे। एक दिन उनके पिता ऑफिस से गुस्सा होकर आए और गौरी ने उनसे बात की तो पिता बोले, 'क्या हिजड़ों की तरह बात करता है', उन्होंने बोला कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो सड़कों पर ताली बजाती फिरेंगी। बस इन सब चीजों ने गौरी को तोड़ दिया। वह अब अपने ही परिवार के साथ घुटन महसूस करने लगी, क्योंकि कोई उन्हें समझने वाला नहीं था।

17 साल की उम्र में छोड़ा घर

ऐसे में उन्होंने घर छोड़ने का फैसला किया। जब 17 साल की उम्र में गौरी ने घर छोड़ा, तब उनके पास केवल 60 रुपए थे। जब गौरी घर छोड़कर दादर पहुंची तो उन्हें एक दोस्त मिला जिसने गौरी को तीन दिन अपने ही घर रखा। इसी दौरान वह एक ट्रस्ट से मिलीं, जो समलैंगिक लोगों के लिए काम करता था। ट्रस्ट से जुड़कर गौरी महीने में 1,500 रुपए भी कमाने लगीं। तभी उन्होंने ठान लिया कि वो दुनिया में आधिकारिक रूप से अपनी पहचान बनाएगी।

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एक बच्ची को दिया नया जीवन 

गौरी समलैंगिक समूह से आने वाले लोगों को जागरूक करने लगीं जिनमें ज्यादातर लोग जीवन निर्वहन के लिए सेक्स वर्कर का काम करते थे। गौरी उन्हें इससे होने वाली बीमारियों के प्रति जागरूक कर रही थी। मगर यहीं उनकी मुलाकात एक सेक्स वर्कर लेडी से हुई जिसे उन्हें सिर्फ एक नजर देखा। समय के साथ 5 साल बीत गए और उस लेडी की मौत हो गई जो अपने पीछे गायत्री नाम की बेटी को छोड़ गई। अकेली बेटी को देखकर लोगों ने उसे बेचने का मन बनाया लेकिन गौरी ने न सिर्फ उसे अंधेरे में जाने से बचाया बल्कि उसकी परवरिश का जिम्मा भी उठाया।

एलजीबीटी एक्टिविस्ट गौरी को मिला मां का सुख 

पहले तो गौरी को वो बच्ची एक मुसीबत लगी क्योंकि उन्होंने कभी किसी के साथ अपना बिस्तर शेयर नहीं किया था लेकिन करीब आधी रात जब बच्ची ने गौरी के पेट पर हाथ रखा तो उन्हें मां का अहसास हुआ जिसके बाद बच्ची के साथ उनका मां-बेटी जैसा रिश्ता बन गया। तो इस तरह गौरी ने अपने बचपन के सपने को पूरा किया। उन्हें एलजीबीटी एक्टिविस्ट होने के बावजूद भी मां बनने का सुख मिला। गौरी गायत्री को गोद लेने की सिफारिश भी कोर्ट में डाली लेकिन कार्ट ने ऐसा करने से इंकार कर दिया लेकिन गौरी उस बच्ची की देखभाल करती रहीं।

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बात अगर उनकी उपब्धियों की करें तो गौरी समलैंगिक लोगों के अधिकारों के लिए लड़ती रही है। उन्होंने धारा 377 के खिलाफ अपनी आवाज उठाई और तीसरे लिंग (ट्रांसजेंडर) को आधार कार्ड दिए जाने की लड़ाई भी लड़ी। उन्हें महराष्ट्र के जलगांव जिले में संत बहिणाबाई अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया। इसके अलावा गौरी देश की पहली ट्रांसजेडर इलेक्शन ऐंबैसड हैं जिन्हें साल 2019 में महाराष्ट्र की गृहणियों और ट्रांसजेंडर्स के बीच मतदान को लेकर जागरुकता बढ़ाने के लिए नियुक्त किया गया। फिलहाल गौरी यौनकर्मियों की बेटियों को बेहतर जिंदगी देने के प्रयास में जुटी हुई हैं।

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