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Doctor's Day: भारत की पहली महिला डॉक्टर आनंदीबाई, बेटे ने बदल दी थी जिंदगी

  • Edited By Anjali Rajput,
  • Updated: 30 Jun, 2020 05:44 PM
Doctor's Day: भारत की पहली महिला डॉक्टर आनंदीबाई, बेटे ने बदल दी थी जिंदगी

कहते हैं डॉक्टर्स भगवान का दूसरा रूप होते हैं। कोरोना संकट के दौर में जिस तरह देशभर के डॉक्टर्स दिन-रात मरीजों की सेवा में लगे हुए हैं, यह बात उनके लिए सटीक बैठती है। कोरोना संकट के इस दौरान में ना सिर्फ पुरूष बल्कि कई महिला डॉक्टर्स भी अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई है। मगर, एक समय ऐसा भी था जब महिलाओं को डॉक्टरी तो क्या स्कूली पढ़ाई करने भी नहीं दिया था। ऐसे में महिलाओं के लिए रोशनी बनकर उभरी थी देश की पहली महिला डॉक्टर आनंदीबाई जोशी।

चलिए आपको बताते हैं देश की पहली महिला डॉक्टर आनंदीबाई जोशी की प्ररेणा व संघर्ष से भरी कहानी...

देश ही पहली महिला डॉक्टर

उनका जन्म 31 मार्च, 1865 को पुणे शहर में हुआ। 18वीं शताब्दी ऐसा था जब पढ़ना तो दूर लड़कियों को घर से बाहर निकलने भी इजाजत नहीं थी। ऐसे में एक शादीशुदा हिंदू महिला का घर के बाहर कदम रखना कितना मुश्किल होगा आप खुद ही सोच सकते हैं। एक तरफ परिवार के तानें और दूसरी तरफ समाज की आलोचनाओं, लेकिन इन बात का उनपर कोई असर नहीं पड़ा।

देश की पहली महिला डॉक्‍टर बन कायम की ...

9 साल की उम्र में हुई शादी

आनंदीबाई की 9 साल की ही थी, जब उनकी शादी 20 साल बड़े गोपालराव से कर दी गई। महज 14 साल की आयु में वह मां बनी लेकिन 10 दिन बाद ही उनके पुत्र की मृत्यु हो गई। अपने बेटे की मौत का आनंदीबाई को गहरा सदमा लगा, जिसे बाद उन्होंने डॉक्टर बनकर असमय होने वाली मौतों को रोकने का फैसला किया।

आनंदीबाई थीं डॉक्टर की डिग्री लेने ...

विदेश से हासिल की डॉक्टरी की डिग्री

हालांकि उनके पति गोपालराव ने डॉक्टर बनने में उनका पूरा साथ दिया और हर कदम पर उनका हौसला बढ़ाया। डॉक्टरी की पढ़ाई करने के लिए वह अमेरिका के पेनिसिल्वेनिया शहर गई और डिग्री लेकर वापिस भारत आ गई। भारत वापिस आने के बाद उन्हें कोल्हापुर, अल्बर्ट एडवर्ड अस्पताल में महिला वार्ड के चिकित्सक विभाग में नियुक्त किया गया। मगर, वह अपने सपने को आगे नहीं ले जा सकीं। 26 फरवरी, 1887 में उनकी सेहत बिगड़ी और 22 साल की छोटी उम्र में ही उनकी मृत्यु हो गई।

Chandramukhi Basu (1860-1944), was a Bengali woman famous for ...

भले ही डॉक्टर के रूप में अधिक समय तक देश की सेवा ना कर पाई हो लेकिन विदेश से डिग्री हासिल कर एक मिसाल कायम कर दी और लड़कियों के लिए नया रास्ता भी खोल दिया। उनके जीवन पर कैरोलिन वेलस ने 1888 में बायोग्राफी लिखी थी। दूरदर्शन पर उनकी बायोग्राफी "आनंदी गोपाल" नाम से प्रसारित हो चुकी है। इसके अलावा उनके जीवन पर मराठी व हिंदी शॉर्ट फिल्में भी बन चुकी हैं।

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