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नारी पहचाने अपनी असली ताकत: अनु सचदेवा

नारी पहचाने अपनी असली ताकत: अनु सचदेवा
Views:- Thursday, January 22, 2015-11:18 AM

नारी में असीम ताकत है। वह न सिर्फ अपने परिवार व काम-काज को भली-भांति संभालते हुए अपनी तमाम जिम्मेदारियां निभा सकती है, बल्कि समाज के उत्थान में भी सराहनीय योगदान दे सकती है। बस जरूरत है कि नारी अपनी असली ताकत को पहचाने और आत्मविश्वास से आगे बढ़े। नारी सदैव इस बात को याद रखे कि वह कोमल जरूर है, कमजोर कतई नहीं।

 यह कहना है स्टेट बैंक ऑफ पटियाला अधीन भटिंडा की एयर फोर्स स्टेशन भिसिआणा ब्रांच की मैनेजर अनु सचदेवा का जो 29 वर्षों से बैंकिंग क्षेत्र में सेवाएं देने के साथ ही समाज सेवा में भी भरपूर योगदान दे रही हैं।
 
अभिभावकों का प्रोत्साहन
6 फरवरी, 1964 को फिरोजपुर में जन्मी  अनु के पिता ओम प्रकाश बजाज इरिगेशन डिपार्टमैंट में एस.डी.ओ. थे व उनकी माता स्वर्ण कांता सिलाई अध्यापिका थीं। शिक्षित अभिभावक होने के नाते वे अपनी दोनों बेटियों और बेटे को उच्च शिक्षा दिलवाना चाहते थे। इसी प्रोत्साहन से अनु ने बी.एस.सी. मैडीकल व बी.एड. तक शिक्षा हासिल की और फिर अपने पैरों पर खड़ा होने के उद्देश्य से टीचिंग व बैंकिंग क्षेत्र में परीक्षाएं दीं जिसमें उन्हें पहली बार में ही सफलता मिली।
 
 26 अक्तूबर, 1985 को उन्हें स्टेट बैंक ऑफ पटियाला में बतौर कैशियर-कम-क्लर्क नियुक्ति मिली और 29 वर्षों से वह बैंकिंग क्षेत्र में सराहनीय सेवाएं दे रही हैं। जून 2013 में उन्होंने पदोन्नति टैस्ट पास किया और बैंक ने उन्हें बतौर मैनेजर पदोन्नत कर दिया। सेवाकाल दौरान उन्होंने बैंक के इंटर जोन मुकाबलों में निरंतर 3 वर्ष 2005, 2007 और 2010 में बैस्ट एक्ट्रैस के अवार्ड भी जीते। 

पारिवारिक सहयोग
अनु कहती है कि बिना पारिवारिक सहयोग उनके लिए कुछ भी कर पाना संभव नहीं होता। पहले मायका परिवार ने उन्हें खूब पढ़ाया-लिखाया व पैरों पर खड़ा किया और 15 अप्रैल, 1990 को स्टेट बैंक ऑफ पटियाला में ही तैनात स्पैशल असिस्टैंट कमल सचदेवा से शादी के बाद उन्हें ससुराल का भी भरपूर सहयोग मिला। 
 
समाज की भलाई हेतु सेवाएं
10 वर्षों से वह ‘देवता यादगारी मालवा कलाकार मंच’ से जुड़कर समाज की भलाई हेतु काम कर रही हैं। विभिन्न जगहों पर जागरूकता सैमीनार आयोजित कर महिलाओं को उनके अधिकारों प्रति जागरूक करना, नि:शुल्क सिलाई-कढ़ाई कैंप लगाकर महिलाओं व युवतियों को व्यावहारिक शिक्षा देना,  नई पीढ़ी को पुरातन विरासत से जोडऩे हेतु सभ्याचारक प्रोग्राम करवाना, रक्तदान-योगा कैंप लगाना इत्यादि उनकी मुख्य गतिविधियां हैं। वह सिविल डिफैंस में बतौर सदस्य और ह्यूमन राइट्स संस्था के महिला विंग की प्रबंधक सचिव भी सेवा दे रही हैं। 
 
वह कहती हैं कि महिलाएं सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ डट कर लड़ें, खुद को कभी भी कमजोर न समझें क्योंकि दुनिया में ऐसा कोई काम नहीं है जो महिलाएं न कर सकती हों। पुरुष को पैदा करने वाली नारी हर हाल में उनसे बेहतर है और वह हर काम पुरुषों से कहीं बेहतर ढंग से कर सकती है।  
 
बच्चों के दोस्त बनें
वह कहती हैं कि अभिभावक अपने बच्चों के दोस्त बनकर रहें। उनमें इतना आत्मविश्वास भरें कि वे हर बात बेझिझक आपसे कह पाएं। बेटा-बेटी में भेद न करें। व्यस्तता में से बच्चों के लिए समय जरूर निकालें, इससे आपसी संबंध मजबूत होते हैं। आज के दौर में अधिकांश काम-काजी मां-बाप बच्चों को रुपया-पैसा व तमाम ऐशो-आराम तो जरूर देते हैं परन्तु उनकी वास्तविक जरूरत यानी अपना समय नहीं दे पाते जिस कारण अक्सर बच्चों व मां-बाप में दूरी बढ़ जाती है। 
 
लड़कियों के लिए स्पोट्रस स्कूल
अनु लड़कियों के लिए स्पोट्रस स्कूल खोलने की इच्छुक हैं ताकि उन्हें शिक्षा के साथ-साथ खेलों में भी आगे लाया जा सके। वह खुद कालेज समय में बैस्ट एथलीट व राज्यस्तरीय स्विमिंग चैम्पियन रह चुकी हैं। सेवानिवृत्ति के बाद वह पूरी जिंदगी समाज सेवा को अर्पित करते हुए एक स्पोट्रस स्कूल का संचालन करेंगी। उनका मानना है कि किताबी शिक्षा लड़कियों को बौद्धिक तौर पर मजबूत करती है परन्तु खेलें लड़कियों को शारीरिक तौर पर मजबूत बनाती हैं जिससे वे जिंदगी में हर अच्छी-बुरी परिस्थिति का सामना बड़ी आसानी से कर सकती हैं।

                                                                                                   -पायल बांसल, भटिंडा (छाया:मीत)