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निरक्षर महिलाओं के जीवन में शिक्षा का उजाला भरने वाली चंदू देवी

निरक्षर महिलाओं के जीवन में शिक्षा का उजाला भरने वाली चंदू देवी
Views:- Thursday, January 8, 2015-1:16 PM
नारी के बिना सृष्टि की रचना संभव नहीं है। महिलाओं की हमेशा से ही एक बेहतर समाज व राष्ट्र निर्माण में बराबर व महत्वपूर्ण भागीदारी रही है। वह जीवन पर्यंत कितने ही रिश्ते बनाती व निभाती है। फिर चाहे वह एक बेटी के रूप में हो या फिर एक  मां, पत्नी या बहन का रिश्ता। एक मां के रूप में वह अपने बच्चे की पहली शिक्षक की भूमिका अदा करती है और समाज को भी शिक्षित करती है परंतु एक ऐसी महिला जिसका बचपन व जवानी पहाड़-सी खड़ी चुनौतियों से लड़ते हुए निरक्षरता के अंधेरे में गुजरा हो, उचित अवसर मिलने पर वह भी कैसे स्वयं, परिवार व समाज में बदलाव ला सकती है यह शिमला जिला के मशोबरा ब्लॉक के तहत आने वाली पंचायत जलेल बटलाणा गांव की चंदू देवी से बेहतर कोई नहीं जान सकता।

पहाड़ की कठिनाइयों से भरपूर जीवन की चुनौतियों पर पार पाते हुए चंदू देवी ने न केवल अपने अंदर के निरक्षरता रूपी अंधकार को मिटाया, बल्कि अपने गांव, इलाके की दूसरी महिलाओं को भी साक्षरता का ज्ञान बांटा। आज वह क्षेत्र की महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बनी हैं। उन्होंने शून्य से शुरू किया और आज उन्हें प्रदेश की पहली  प्रौढ़ महिला साक्षर होने का गौरव प्राप्त है। चंदू देवी का यह सफर काफी चुनौतीपूर्ण व रोचक रहा। 

ज्ञान विज्ञान समिति के जरिए 1 मार्च 1992 में मशोबरा की 15 पंचायतों में शोघी से साक्षरता अभियान शुरू  हुआ। अभियान के शुभारंभ पर तब के मुख्य संसदीय सचिव रूपदास कश्यप ने पहली किताब 60 वर्षीय चंदू देवी को दी थी। यह वह समय था जब प्रौढ़ निरक्षरता व्यापक स्तर पर फैली थी। चंदू देवी के पति एक ज्योतिषी के साथ-साथ इलाके के नम्बरदार भी थे और काम के सिलसिले में अक्सर घर से बाहर रहते थे। इसके चलते घर की पूरी जिम्मेदारी चंदू देवी पर ही थी। 

स्थानीय पंचायत घर में कक्षाएं शुरू हुईं और चंदू देवी घर का काम निपटा कर रोज दो घंटे यहां कक्षाएं लगाने आती थीं। परंतु गांव की अन्य निरक्षर महिलाएं/पुरुष पढ़ाई से मुंह फेर लेते थे। महिलाओं का तर्क होता था कि उन्हें जंगल से लकड़ी व घास आदि लाने जाना पड़ता है इसलिए वे  पढ़ाई नहीं कर सकतीं। चंदू को जब इस समस्या के बारे में पता चला तो उन्होंने उक्त महिलाओं को अपने घर से लकडिय़ां व घास देना शुरू किया ताकि वे सभी पढ़ सकें। चंदू देवी कहती हैं घरेलू कार्य के बोझ की वजह से शुरू-शुरू में गांव की महिलाएं पढ़ाई करने से मुकर जाती थीं। तब मैंने महिलाओं को अपने घर से लकडिय़ां आदि दीं और उनके साथ काम में हाथ बंटाया तो इसके बाद उन्होंने कक्षाएं लगानी शुरू कर दीं। इस तरह सभी निरक्षर पढऩे  के लिए आने लगे। 

चंदू ने महिलाओं को प्रेरित किया कि पढ़ाई उनके लिए कितनी महत्वपूर्ण है। इसके बाद उन्होंने पूरे इलाके के निरक्षरों को पढऩे के लिए प्रेरित किया। शिक्षा के प्रति यह चंदू का जुनून ही था कि वह अपने घर से करीब 20 कि.मी. दूर शिमला की सब्जी मंडी में हर सुबह सब्जियां बेचने पहुंचती थीं और इसके बाद वापस जाकर कक्षाएं लगातीं। साथ ही अपनी दो बेटियों की देखभाल भी करतीं। यही नहीं उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या व दहेज प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों को उखाड़ फैंकने के लिए भी महिलाओं को जागरूक किया। वह कहती हैं ‘‘जब मैं कम उम्र की थी तो कन्याओं को बचपन में ही मारने व दहेज प्रथा जैसे गलत काम होते थे। अब इसको लेकर लोगों में काफी जागरूकता है।’’ 

वह महिलाओं को ऐसे कृत्यों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रेरित करती रहती हैं। चंदू ने ‘सहल’ नामक महिला मंडल की शुरूआत की और वह इसकी प्रधान भी हैं। इसके अलावा वह बाद में वार्ड मैंबर भी रहीं। वर्ष 2001 से 2005 तक वह जलेल पंचायत की उप प्रधान रहीं। चंदू को एम.एच.आर.डी. की ओर से दिल्ली में आयोजित साक्षरता सम्मेलन में उनकी विशिष्ट उपलब्धियों के लिए सम्मानित किया गया। उन्होंने मंच पर 15 मिनट भाषण देकर कार्यक्रम में मौजूद करीब 8 हजार लोगों से अपने जीवन के अनुभवों को सांझा किया। उन्हें गत 23 नवम्बर को ज्ञान विज्ञान समिति की ओर से गेयटी (शिमला) में आयोजित 24वें स्थापना दिवस पर सम्मानित किया गया।

उम्र के इस अंतिम पड़़ाव पर भी चंदू पूरी तरह सक्रिय है। आज 83 वर्ष की उम्र में भी  वह उतनी ही ऊर्जावान व मजबूत इरादों वाली दिखती हैं जितनी 20 वर्ष पहले थीं। आज भी वह गांव की महिलाओं, बेटियों को संस्कारी शिक्षा बांटती हैं। उनकी दोनों बेटियों की काफी समय पहले शादी हो चुकी है और पति का भी देहावसान हो चुका है बावजूद इसके वह घर के सारे काम अकेले ही करती हैं।