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सिर्फ किताबी ज्ञान ही नहीं जिंदगी जीने का ढंग भी सिखाता है स्कूल : सुदेश अहलावत

सिर्फ किताबी ज्ञान ही नहीं जिंदगी जीने का ढंग भी सिखाता है स्कूल : सुदेश अहलावत
Views:- Thursday, January 1, 2015-3:37 PM

यदि कोई ऐसा स्कूल हो जहां बच्चों का दाखिला लेने के लिए माता-पिता को साक्षात्कार न देना पड़े, पहली से लेकर पांचवीं कक्षा तक कोई किताबें न उठानी पड़ें तो ऐसी स्थिति में हमें निश्चित ही आश्चर्य होगा। जी हां एक स्कूल ऐसा भी है जिसका नाम ‘दृष्टि’ है जो नारंगवाल (लुधियाना) में चलाया जा रहा है। बच्चों को उत्तम श्रेणी की पढ़ाई करवाना तथा नैतिक मूल्यों से परिचित करवाना इस स्कूल का उद्देश्य है जो डा. आर.सी. चैरीटेबल ट्रस्ट लुधियाना के प्रबंधों के अधीन चल रहा है। इस की डायरैक्टर श्रीमती सुदेश अहलावत हैं जो प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री हैं और इससे पहले बी.बी.के. डी.ए.वी. कालेज फार वूमैन अमृतसर की प्रिंसीपल रह चुकी हैं। गत दिवस वह ‘पंजाब केसरी’ के दफ्तर में आईं तो उनके साथ ‘दृष्टि’ के बारे में कुछ बातें हुईं :

‘दृष्टि’ जैसे स्कूल को अस्तित्व में लाने का सपना कैसे साकार हुआ?
—आज बच्चों की शिक्षा का मामला बहुत बड़ा है। उन्हें क्या पढ़ाया जाए और कैसे पढ़ाया जाए, स्कूल का माहौल कैसा हो और किस तरह के वातावरण में बच्चों को शिक्षा दी जाए। हमने सोचा कि एक ऐसा स्कूल बनाया जाए जहां बच्चे घर जैसे वातावरण की तरह महसूस करके पढ़ें।

अपने करियर के बारे बताएं?
—मैं 1960-67 तक मैं जालंधर के हंसराज महिला विद्यालय में गणित की प्रोफैसर रही और फिर डी.ए.वी. कालेज अमृतसर में प्रिंसीपल के तौर पर मेरी नियुक्ति हो गई। दिसम्बर 1998  में मैं रिटायर्ड हो गई। मुझे शिक्षा प्रणाली का अध्ययन करने विदेश जाने का मौका मिला जिसे स्टडी करने के बाद लगा कि अभी तो हम बहुत पीछे हैं। दूसरी ओर शिक्षा बहुत महंगी हो गई थी और हर बच्चे का स्कूल तक पहुंचना मुश्किल हो रहा था।

‘दृष्टि’ तक कैसे पहुंचीं?
—लुधियाना में डा. आर.सी. जैन जी की हिम्मत से ही यह सब संभव हो सका। डा. आर.सी. जैन गवर्नमैंट  कालेज लुधियाना के पूर्व प्रोफैसर हैं और गवर्नमैंट कालेज हिसार के प्रिंसीपल रहे हैं। कुछ और लोग जिनमें  डा. ए.के. शर्मा, श्री रविंद्र जैन, श्री सुभाष जैन तथा श्रीमती वी. पुरी के साथ सलाह-मशविरा करके इस स्कूल की रूपरेखा बनाई गई। आर्थिक तौर पर कमजोर अभिभावकों के बच्चों को भी बराबर के अवसर देने के लिए यह फैसला किया गया कि स्कूल को ‘नो प्रॉफिट नो लॉस’  के आधार पर चलाया जाए फिर इसके लिए जगह की तलाश की गई और 7 एकड़ जमीन में यह स्कूल बनाया गया।

इसकी स्थापना  कब की गई?
—सन् 2006 में स्थापित यह स्कूल ‘नैशनल करिकुलम फ्रेमवर्क 2005’ के सिद्धांतों और आदर्शों के अनुसार कार्यरत है। डी.ए.वी. पब्लिक स्कूल अमृतसर की पूर्व  प्रिंसीपल श्रीमती विजय पुरी इसकी प्रिंसीपल और मैनेजर हैं।

स्कूल में बच्चों को किस तरह पढ़ाई करवाई जाती है?

—स्कूल में पहली कक्षा से लेकर पांचवीं कक्षा तक बच्चों पर बस्ते का बोझ नहीं है। वे घर से सिर्फ टिफिन लेकर ही आते हैं। बाकी सारी पढ़ाई  वैसे ही करवाई जाती है। पांचवीं कक्षा तक कोई भी परीक्षा नहीं ली जाती। कम्प्यूटर लैब, वाई-फाई तथा हर कक्षा में  पी.सी. टैब के प्रयोग की सुविधा स्कूल के शिक्षा संबंधी वातावरण को  उन्नत करती है। डांस, ड्रामा, संगीत, आर्ट एंड क्राफ्ट तथा रचनात्मक लेखन को भी शिक्षा प्रणाली का हिस्सा बनाया गया है।
 
छात्र कितने हैं और अध्यापकों की क्या स्थिति है?
—कक्षाओं में विद्यार्थियों की संख्या को सीमित रखा गया है और यह 1:12 के अनुपात में है। अध्यापकों हेतु कई  ट्रेनिंग कैम्प लगाए जाते हैं। बच्चों को लाइब्रेरी में पढऩे की आदत पैदा करने हेतु प्रेरित किया जाता है। उनमें रुचि पैदा की जाती है कि वे अपना होमवर्क तनावमुक्त  होकर करें। स्पोट्र्स कोच खेलों में एक घंटा प्रतिदिन विद्यार्थियों को देते हैं।
 
पिछड़ी श्रेणियों या आर्थिक तौर पर कमजोर अभिभावकों के बच्चों को कैसे दाखिल करते हैं?

—850 बच्चों में से लगभग 40 बच्चे ऐसे हैं जिन्हें बिना फीस के पढ़ाया जाता है। हमारा उद्देश्य है कि होशियार बच्चा कभी भी फीस के अभाव में शिक्षा से वंचित न रहे। इससे भी आगे जाकर हम स्लम एरिया के बच्चों के लिए और स्पैशल बच्चों, जो ड्राऊन सिंड्रोम व अन्य ऐसी ही व्याधियों से पीड़ित हैं, के लिए ‘उड़ान’ नामक एक सैक्शन चला रहे हैं। वर्तमान में हमारे पास 20 ऐसे बच्चे हैं। इनमें से जो बच्चे अपने प्रयास से आगे बढ़ जाते हैं उन्हें भी बाकी बच्चों के साथ शामिल कर लिया जाता है। हम समर्थ बच्चों को असमर्थ बच्चों की मदद करना भी सिखाते हैं। बच्चे इस स्कूल में सिर्फ किताबी ज्ञान ही प्राप्त नहीं करते बल्कि जिंदगी जीने का ढंग भी सीखते हैं।

                                                                                                                                                    —कुलदीप सिंह बेदी